फिर से

जो मिले मेरे दिल को करार फिर से,
तो मैं लिख दूं चंद अशार फिर से|

न तलाश का इल्म है, न रास्तों की खबर,
जिंदिगी हो गयी है बेकार फिर से|

टूटे दिल को समेट रहा हूँ तिनका-तिनका,
ताकि कर सको तुम टुकड़े हज़ार फिर से|

तुम गए तो कोई पूछने वाला न बचा,
अब कहाँ से लाऊँ कोई तलबगार फिर से|

एक ज़र्रे में समा गयी है सारी खलिश,
तुम मुझे छु कर करदो गुबार फिर से|

सब भुला दूं जो गुज़री है मुझ पर,
कर दूं ये दिल तुम पर निसार फिर से|

अपनी गज़लों को नीलाम कर रहा हूँ,
मैं बन गया हूँ चलता बाज़ार फिर से|

जितनी कुर्बत मिली उतना तडपा है ‘वीर’,
अब बना रहा है नयी चार दीवार फिर से|

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  • Deevasg

    Bahut Khoob….फिर से…..:)

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