पूरी कहाँ होगी हसरत तुम्हारी

थोड़े और की आरजू तो मरते दम तक रहेगी,
चंद ख्वाइशों से पूरी कहां होगी हसरत तुम्हारी|

ज़रा सोच समझके ही इल्जाम लगाना मुझ पर,
जान ही ना ले जाए मेरी ये फितरत तुम्हारी|
चंद ख्वाइशों से पूरी कहां होगी हसरत तुम्हारी…

मेरे ख्याल मुझसे पहले तेरे ज़हन में करवट लें,
कहीं मुझे रुसवा ना कर दे इतनी कुर्बत तुम्हारी|
चंद ख्वाइशों से पूरी कहां होगी हसरत तुम्हारी…

जिंदगी का मकसद उसकी तलाश हो सकती थी ‘वीर’,
ये क्या कम है के मिल गयी तुम्हें मोहब्बत तुम्हारी|

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