रोज़ देखता हूँ!

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सियासत का वहशी नंगा नाच.. रोज़ देखता हूँ,
हाथों में पत्थर, पैरों में कांच.. रोज़ देखता हूँ|

कभी इसके सर तो कभी उसके सर टांग दिया,
हर नए दिन एक नया सरताज.. रोज़ देखता हूँ|
हाथों में पत्थर, पैरों में कांच.. रोज़ देखता हूँ|

तुम मोदी चिल्लाते हो, या फिर राहुल जपते हो,
मैं तुम्हारे सीने में दफन राज़.. रोज़ देखता हूँ|
हाथों में पत्थर, पैरों में कांच.. रोज़ देखता हूँ|

ये कैसा इन्कलाब है जो कभी आया ही नहीं,
मुफलिसों के चेहरों पर भूख़ की आंच.. रोज़ देखता हूँ|

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