रुसवाई

रुसवाई नहीं हमने वफ़ा की है,
छोड़ के हाथ तेरा खुदको सज़ा दी है|

उम्र भर इंतज़ार रहा उस हमनफ़स का,
तेरे संग हमने चार लम्हों में जिंदिगी जी है|
छोड़ के हाथ तेरा खुदको सज़ा दी है…

जो है क्यों है, जो नहीं क्यों नहीं,
हसरतों ने फिर कहीं आवाज़ की है|
छोड़ के हाथ तेरा खुदको सज़ा दी है…

अब जो फ़ना हो जाओं सुकून से,
मौत ने मेरी खुदी से थोड़ी मोहलत ली है|
छोड़ के हाथ तेरा खुदको सज़ा दी है…

मद्धम रौशनी में इतना उजाला कैसे लिपट गया,
कैसे बेखुदी ने ख्वाब बुनने की हिमाकत की है|
छोड़ के हाथ तेरा खुदको सज़ा दी है…

हम तो सुखी रेत में अब भी पानी ढूँढते हैं,
हमने कब कोई ज़माने से शिकायत की है|
छोड़ के हाथ तेरा खुदको सज़ा दी है…

कह दो अकलमंदो से चुप ही रहें वो,
हमने हमेशा सिर्फ अपने दिल कि की है|
छोड़ के हाथ तेरा खुदको सज़ा दी है…

किसने जलाई है, कबसे जलाई है, क्यों जलाई है,
ये आग तेरी ‘वीर’ शायद तेरी खुदी की है|
छोड़ के हाथ तेरा खुदको सज़ा दी है…

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