सपने टूटते हैं

सपने टूटते हैं और फिर आहिस्ता संवर भी जाते हैं,
हम एक जिंदिगी में कई बार जीते हैं, कई बार मर जाते हैं|

इस दुनिया में कुछ भी पत्थर की लकीर सा नहीं है,
वक्त सोते हुए करवट लेता है, और लोग बदल जाते हैं|
सपने टूटते हैं और फिर आहिस्ता संवर भी जाते हैं…

शाम होते ही सताती हैं मुझे, यादें उन गुज़रे दिनों की,
शब होते-होते अक्सर हम अपने ही माज़ी से डर जाते हैं|
सपने टूटते हैं और फिर आहिस्ता संवर भी जाते हैं…

दिन भर अधूरी साँसों का वजन दिल पर भारी रहा,
कई मंजिलों से गुज़र चुके हैं, लो अब घर जाते हैं|
सपने टूटते हैं और फिर आहिस्ता संवर भी जाते हैं…

बहुत हुआ रुसवाई और तन्हाई का खेल खुद से ‘वीर’,
गर हिम्मत है तो क्यों नहीं, बस खामोश मर जाते हैं|

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