शम्मा

शम्मा देर तलक जलती रही|

ख़त्म हुई महफ़िल-ए-जीस्त मगर,
शम्मा देर तलक जलती रही|

सामना हुआ हकीकत से फिर क्यों,
आरजू दिल में कोई पलती रही|
शम्मा देर तलक जलती रही|

मेरा कसूर था या यारों की मोहब्बत,
सहर तक मेरे पैमाने में मय डलती रही|
शम्मा देर तलक जलती रही|

उसके रुखसत से ही ख़त्म हुई ज़िन्दगी,
खोकले जिस्म में मगर सांस चलती रही|
शम्मा देर तलक जलती रही|

लिखने वाले की खता नहीं है ‘वीर’,
इन हातों की लकीरें ही बदलती रही|

शम्मा देर तलक जलती रही|

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