शर्त

मिलता है मगर बिछड़ने की शर्त पर,
जिंदा तो है मगर मरने की शर्त पर |

जिंदिगी तेरी अदा है या बेबसी मेरी,
होसला मिलता है मगर डरने की शर्त पर |
जिंदा तो है मगर मरने की शर्त पर…

पल दो पल से ज़्यादा कहीं भी रुकता नहीं,
वक्त अच्छा आता है गुजरने की शर्त पर |
जिंदा तो है मगर मरने की शर्त पर…

ये रिहाई भी क्या कोई रिहाई है सितमगर,
परिंदा आज़ाद किया पंख कतरने की शर्त पर |
जिंदा तो है मगर मरने की शर्त पर….

फिर किस बात का भरोसा करिये ‘वीर’,
वो वादा भी करते हैं मुकरने की शर्त पर |

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  • Deevasg

    Bohot khoob. Bohot wazandaar!!

  • Deevasg

    Pal do pal se zada rukta nahin
    Yeh bohot hi achha sher hai.

    • @Deevasg मेरा भी!

  • yashodadigvijay4

    सुन्दर रचनाइसे मै लिये जा रही हूँआप ही के नाम से अपने ब्लाग मेरी धरोहर में रखूँगी सादर

  • yashodadigvijay4

    कृपया यहाँ देखिये इस ग़ज़ल को
    http://4yashoda.blogspot.in/2013/03/blog-post_4.html

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