शिकवा जिंदिगी से

अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से,
ज़हर पी लिया हमने अपनी खुशी से|

भटकते ख्यालों का जशन ना हो खत्म,
कुछ सिलसिले बना रखे हैं सभी से|
अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से…

ढूँढता है वो मुझे गलियों गलियों,
जब हम मिट चुके हैं कभी के|
अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से…

मेरा नाम लिए फिरता हैं शहर भर,
मैं उसे पहचानू कैसे सभी से|
अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से…

वो लम्हा काफी है उम्र भर को ‘वीर’,
उस लम्हे में हम मिले थे खुदी से|

0.00 avg. rating (0% score) - 0 votes
  • वो लम्हा काफी है उम्र भर को ‘वीर’,
    उस लम्हे में हम मिले थे खुदी से

    -बहुत बढ़िया.

%d bloggers like this: