ताकत बहुत चाहिए

taakat-bahoot-chahiye

खामोश रहने के लिए, ताकत बहुत चाहिए,
ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए|

यूँ तो मुझे भी हासिल है अदा रूठने की,
रूठे रहने के लिए, अदावत बहुत चाहिए|
ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए…

उम्र भर हम तुझे दुआओं में मांगते रहे,
मगर असर के लिए, इबादत बहुत चाहिए|
ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए…

अब क़ैद-ए-वफ़ा से मैं रिहाई चाहता हूँ,
मेरे मुंसिफ को मगर, ज़मानत बहुत चाहिए|
ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए…

ये तिश्नगी कैसी है जो बुझती ही नहीं,
दिल ए कमज़र्फ को, मोहब्बत बहुत चाहिए|
ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए…

छू कर जाए दिल मगर खरोंच न हो ‘वीर’,
मेरे नुकीले शैरों को, नजाकत बहुत चाहिए|
ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए…

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