तन्हा हम तेरे बिन

किसी बंद किताब के धुंधले किरदार से नज़र आते हैं,
तन्हा हम तेरे बिन कितने पन्नों में बिखर जाते हैं|

लफ़्ज़ों की कोई कड़ी उँगलियों से लिपट जाती है,
जैसे हमें कुछ बिछड़े हुए साथ वापस बुलाते हैं|
तन्हा हम तेरे बिन कितने पन्नों में बिखर जाते हैं…

कोई फ़साना नहीं दस्तूर – ए – जिंदगी है,
जो जुदा हुए हैं वो अक्सर बिछड़ जाते हैं|
तन्हा हम तेरे बिन कितने पन्नों में बिखर जाते हैं…

काले सच को सफ़ेद झूटों से पिरोया तो है ‘वीर’,
फिर क्यों आँखों के ये बादल पिघल जाते हैं|
तन्हा हम तेरे बिन कितने पन्नों में बिखर जाते हैं…

अब जो गिरें अश्क तो दामन में ही गिरें ‘वीर’,
गर गिरे जो पन्नों में तो देर तलक रुलाते हैं|
तन्हा हम तेरे बिन कितने पन्नों में बिखर जाते हैं…

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