तन्हा जाम

एक हम ही नहीं अकेले, तेरे मयखाने में साकी,
महफ़िल में आज, कुछ तन्हा जाम भी थे|

मंजिल पर खड़े सोच रहा हूँ,
सफ़र में, कुछ इससे हंसीं मकाम भी थे|
महफ़िल में आज, कुछ तन्हा जाम भी थे…

मेरे जूनून को समझ कौन पाता,
यारों में कुछ संगदिल, तो कुछ अक्ल के गुलाम भी थे|
महफ़िल में आज, कुछ तन्हा जाम भी थे…

यूं तो ज़माने से अच्छी दोस्ती है हमारी,
मुस्कुराती खामोशियों में कुछ इलज़ाम भी थे|
महफ़िल में आज, कुछ तन्हा जाम भी थे…

हाकिम है जो मेरे गुनाहों के,
कुछ साल पहले, वो हमसे बदनाम भी थे|
महफ़िल में आज, कुछ तन्हा जाम भी थे…

उसके घर का पता किस से पूछे ‘वीर‘,
शहर में उनके, कुछ आशिक गुमनाम भी थे|
महफ़िल में आज, कुछ तन्हा जाम भी थे…

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