तेरे सिवा अब कोई नहीं

चल उठ के देर हो गयी है घर जाने में,
तेरे सिवा अब कोई नहीं, इस मयखाने में |

एक लम्हा था जो कमज़ोर कर गया मुझे,
वरना एक उम्र छोटी थी, उसको भुलाने में |
तेरे सिवा अब कोई नहीं, इस मयखाने में …

ये खेल है तेरी उलझी ज़ुल्फों का हमनफस,
के बात बिगड़ती चली गयी, बात बनाने में |
तेरे सिवा अब कोई नहीं, इस मयखाने में …

मैं लौट न सकूं तो बेवफ़ा मत समझना ‘वीर’,
तुमसे ही शायद देर हो गयी, वापस आने में |

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