तेरी कांपती उँगलियाँ

मेरे जबीं पर तेरी कांपती उँगलियाँ,
जैसे सूखे फूल पर नाचती तितलियाँ|

कितना कुछ समाया था सायों में,
गूंजती रही देर तलक खामोशियाँ|
मेरे जबीं पर तेरी कांपती उँगलियाँ…

ख्यालों से बेपनाह मोहब्बत तक,
क्या क्या ना था हमारे दरमियाँ|
मेरे जबीं पर तेरी कांपती उँगलियाँ…

वक्त को रुसवा कर गयी मोहब्बत,
ढूँढ रहा था वो अपनी खोई कश्तियाँ|
मेरे जबीं पर तेरी कांपती उँगलियाँ…

तू पहला तो नहीं है ना ‘वीर’,
कितनों ने की है फ़ना हस्तियाँ|
मेरे जबीं पर तेरी कांपती उँगलियाँ..

कोई तो है जिसने सुना तुझे ‘वीर’,
वरना दम तोड़ देती तेरी सिसकियाँ|
मेरे जबीं पर तेरी कांपती उँगलियाँ…

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