थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा

थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो,
थोडा काफिर सा थोडा खुदा है वो|

दिल के बहुत करीब तो है मगर,
फिर भी कुछ थोडा सा जुदा है वो|
थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो…

वक़्त, किस्मत, हालात और मजबूरी,
जाने किस-किस से तन्हा लड़ा है वो|
थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो…

ज़ाहिर है ज़ख्म-ए-दिल के दागों से,
हर दिन थोडा-थोडा मरा है वो|
थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो…

ज़ुल्म-ए-जिंदिगी से घबराता नहीं,
बस खंजर-ए-लफ़्ज़ों से डरा है वो|
थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो…

मौत आती नहीं ऐसे ही पास ‘वीर’,
पल-पल उसकी ओर चला है वो|
थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो…

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