थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा

थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो,
थोडा काफिर सा थोडा खुदा है वो|

दिल के बहुत करीब तो है मगर,
फिर भी कुछ थोडा सा जुदा है वो|
थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो…

वक़्त, किस्मत, हालात और मजबूरी,
जाने किस-किस से तन्हा लड़ा है वो|
थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो…

ज़ाहिर है ज़ख्म-ए-दिल के दागों से,
हर दिन थोडा-थोडा मरा है वो|
थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो…

ज़ुल्म-ए-जिंदिगी से घबराता नहीं,
बस खंजर-ए-लफ़्ज़ों से डरा है वो|
थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो…

मौत आती नहीं ऐसे ही पास ‘वीर’,
पल-पल उसकी ओर चला है वो|
थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो…

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  • ज़ुल्म-ए-जिंदिगी से घबराता नहीं,
    बस खंजर-ए-लफ़्ज़ों से डरा है वो

    बहुत खूब

  • ज़ुल्म-ए-जिंदिगी से घबराता नहीं,
    बस खंजर-ए-लफ़्ज़ों से डरा है वो|
    थोडा ज़ाहिर सा थोडा छुपा है वो…
    ………………………………………
    सुंदर रचना

  • आशीष और राकेश जी, आप दोनों को एक ही शेर पसंद आया..

    प्रोत्साहन के लिए, शुक्रिया!

  • इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

    • मेरी भी यही कोशिश है की अपने लेखन को नियमित रूप से इस चिट्ठे पर प्रकाशित करता रहूँ|
      धन्यवाद|

  • विचार को एक मंच देकर आपने एक सराहनीय कदम उठाया है. समाज के लिए पथ प्रदर्शक लेखों के साथ चिट्ठा जगत में आपके आगमन पर शुभकामनाएँ.

    गंगा धर शर्मा ‘हिंदुस्तान’

  • very nice .. onair on fmgold tonight by me http://surabhiisaxena77.blogspot.in/

    RJ SURABhi FB https://www.facebook.com/surabhii.saxena1977

    • I am In Bangalore 🙁

      I hope you give due credits while using my work. I see that you have posted my work on your FB page without credits.

      I am particular about copyright and would request you to make sure you honour my rights.

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