तुम और मैं

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राह-ए-उल्फत में अपना ठिकाना न आया,
मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया|

साज़-ए-जिंदिगी ने सुर ऐसा छेडा,
मुझे गाना न आया, तुम्हें गुनगुनाना न आया|
मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया…

बच्चों की तरह गिले भी बड़े हो गए,
मुझे भुलाना न आया, तुम्हें मिटाना न आया|
मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया…

वो घर जिसे तामीर किया था बड़ी शिद्दत से,
मुझे बनाना न आया, तुम्हें सजाना न आया|
मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया…

वस्ल की रात कटी इसी जुस्तजू में,
मुझें उठाना न आया, तुम्हें जगाना न आया|
मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया…

तर्क-ए-ताल्लुक में भी कहीं कमी रह गयी,
मुझे संभलना न आया, तुम्हें गवाना न आया|
मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया…

एक उम्र कटी ऐसे की फिर मुद्दतें हो गयी,
मुझे आना न आया, तुम्हें बुलाना न आया|
मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया…

लम्हों की दौलत से दोनों महरूम रहे ‘वीर’,
मुझे चुराना न आया, तुम्हें कमाना न आया|

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