तुम पर जचता नहीं

मुझ पर दावा-ए-हक का तलबगार न बन,
ये शौक़ है ज़माने का, तुम पर जचता नहीं |

रोज़ कमाते हैं तब ही रोज़ खाते हैं,
महीने के आखरी में, जेब में कुछ बचता नहीं |
ये शौक़ है ज़माने का, तुम पर जचता नहीं…

बाबूजी की तेरहवी है या फिर बिट्टू की बरात,
गरीब के घर में, यूँ ही पंडाल लगता नहीं|
ये शौक़ है ज़माने का, तुम पर जचता नहीं…

होसलों की देखरेख में खवाब बड़े हो गए,
अब इन चार दीवारों में, दिल लगता नहीं |
ये शौक़ है ज़माने का, तुम पर जचता नहीं…

महनत मेरा ईमान है और कर्म मेरी पूजा,
एहसान हो या बदला कोई, मैं उधार रखता नहीं|

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  • sangeetaswarup

    बहुत खूब …. 

  • Deevasg

    Bahut Khoob Sir!! 🙂

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