उसी पुराने मर्ज़ से

नाज़ुक मिजाज़ी के शिकार हुए हैं हम,
उसी पुराने मर्ज़ से बीमार हुए हैं हम |

दिल में उठती हैं शिकायतें कई सोई हुई,
एक ज़र्रे से उठके गुबार हुए हैं हम |

न शराब और न आखें ही काम आएंगी,
अपनी सकरी सोच के खुमार हुए हैं हम |

बचपन हमारा अधूरा ही रह गया ‘वीर’,
नादान जवानी के शिकार हुए हैं हम |

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