वीर हर शय से बेगाना है

कहाँ जाना है और क्यों जाना है,
बेमतलब के सवाल है, वीर हर शय से बेगाना है|

मैं बदला नहीं ज़र्रा भी मुद्दत में,
दिल अरसे से दीवाना था, दिल आज भी दीवाना है|
वीर हर शय से बेगाना है…

मुझको किसी से कोई वास्ता ना रहा,
इस बवाल से मुझे दूर, बहुत दूर जाना है|
वीर हर शय से बेगाना है…

सब रास्ते अपने थे और सब मुसाफिर नदीम,
एक वो ज़माना था, एक ये ज़माना है|
वीर हर शय से बेगाना है…

मंजिल कोई सूझती नहीं आवारा दिल को,
गुमराह जिंदगी का भी, क्या कोई फ़साना है|
वीर हर शय से बेगाना है…

अपने आशियां का मैं हो ना सका,
कभी इस डगर कभी उस डगर मेरा ठिकाना है|
वीर हर शय से बेगाना है…

खलिश का नाम दे दिया मेरी कमी को,
जो भूल गया मुझे उसे याद क्या दिलाना है|
वीर हर शय से बेगाना है…

थोड़े ज़हर से तेरा काम ना चलेगा,
उठा पूरा जाम आज बहुत कुछ दफनाना है|
वीर हर शय से बेगाना है…

शख़्सियत में और कुछ भी बचा नहीं,
अपने जुनून के अंजाम से अब क्या घबराना है|
वीर हर शय से बेगाना है…

कोई क्यों पूछे के हुआ क्या है ‘वीर’,
वही लाइलाज मर्ज़ है अपना, वही दर्द पुराना है|
वीर हर शय से बेगाना है…

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