यादों में अब भी वो शहर बसा है

उससे बिछड़ने का मुझे गिला है,
यादों में अब भी वो शहर बसा है|

उस गली के किस्से अबतक महकते हैं,
मेरा कुछ अब भी उस गली में  पड़ा है|
यादों में अब भी वो शहर बसा है…

लौट के जाना मुमकिन हो भी सही,
लेकिन मेरा कौन अब वहां बचा है|
यादों में अब भी वो शहर बसा है…

नुक्कड़ की वो दूकान अभी वहीँ है,
कोई हाँथ में सिक्का लिए वहीँ खड़ा है|
यादों में अब भी वो शहर बसा है…

जन्नत पा लूँगा इस शहर से निकल कर,
जब निकला तो पाया कोई सजा है|
यादों में अब भी वो शहर बसा है…

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  • Chandrama

    You have a nostalgic tinge to each of your poem. Guess that makes it even more beautiful. Something you can so relate to!

  • It’s just great to know you, else I’d have been deprived of all this!

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