ज़ख्म

माज़ी के दाग यादों से जाते क्यों नहीं,
मैं तो भुल चला, ये ज़ख्म मुझे भुलाते क्यों नहीं|

झटक दूं इन्हें ज़हन से तो साँस मिले,
मार तो दिया है मुझे, ज़ालिम दफनाते क्यों नहीं|

ना अश्क से सींचा, ना ख्यालों की ज़मीन दी,
फिर भी दर्द के ये फूल, मुरझाते क्यों नहीं|

क्या तेरा रूठना गवारा है हसरतों को ‘वीर’,
ख्वाब नए देकर तुझे मनाते क्यों नहीं|

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