ज़रूरी

वक्त के हाथों बिक गए हैं कई इंकलाब ज़रूरी,
बहते हैं अश्क से के सहरा में है आब ज़रूरी |

अपनी दोहरी शक्सियत से पशेमां क्यों रहूँ,
आबाद को समझने के लिए है खराब ज़रूरी |
वक्त के हाथों बिक गए हैं कई इंकलाब ज़रूरी…

कहो ज़ोर से मगर हलक से चीख न निकले,
सच बोलने के लिए भी है आदाब ज़रूरी |
वक्त के हाथों बिक गए हैं कई इंकलाब ज़रूरी…

उसकी नज़र से क्या बच पाया है बता ‘वीर’,
फिर क्यों है इन मरासिमों में हिसाब ज़रूरी |

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