जिंदिगी को चख कर देखा

zindigi ko chakh kar dekha

जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी,
गुज़रे सब सालों की फसल बरबाद लगी|

एक-एक करके सारा वक्त लूट लिया सबने,
रिश्तों की ज़िम्मेदारियाँ लालची दामाद लगी|
जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी…

शहर की रोशन सड़कों में तन्हाई का बसेरा है,
हमें मोहल्लों की स्याह गलियां आबाद लगी|
जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी…

बूढ़े बाप ने जवान बेटों को फटकारा जब,
मेरे कानों को उसकी हुंकार फरयाद लगी|
जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी…

हकीकत के पिंजरे में होसला टूट जाता है,
मुझे तो ख्वाबों की दुनिया ही आज़ाद लगी|
जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी…

ये सच है की दुआओं का असर हुआ मगर,
ये भी हुआ के दुआ मेरे गिरने के बाद लगी|
जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी…

एक नहीं सैकड़ों को देखा है मैंने ‘वीर’,
हम जैसों की दुनिया में बहुत तदाद लगी|
जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी…

जिंदिगी को चख कर देखा
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