जिंदिगी रूठी हुई

zindigi-rothi-hui

है लम्हें का अरमान मुझसे लिपट जाने का,
देख रही है उसे हसरत से.. जिंदिगी रूठी हुई|

मैं अपने ख़वाब जग ज़ाहिर नहीं करता,
ये सलतनत है मेरी सभी से लूटी हुई|
देख रही है उसे हसरत से जिंदिगी रूठी हुई..

उसने संभाल कर अलमारी में दफना दिया,
वो जो एक चूड़ी थी उस दिन की टूटी हुई|
देख रही है उसे हसरत से.. जिंदिगी रूठी हुई

फिर वही मंज़र है मेरी आँखों में ‘वीर’,
कोई जुस्तजू है किसी हसरत से रूठी हुई|

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