जुबां आखिर जुबां है

मुमकिन है बात गलत, मुँह से निकल गई होगी,
जुबां आखिर जुबां है, बेइरादा फिसल गई होगी|

बंद तालों में कब तक, रखें अपनी हसरतों को,
तमन्ना एक मासूम सी, दिल में मचल गई होगी|
जुबां आखिर जुबां है, बेइरादा फिसल गई होगी…

मेरे लफ्ज़ जानते हैं, तुम्हारी अहमियत को,
उनकी दिल से ईमानदारी, भटक गई होगी|
जुबां आखिर जुबां है, बेइरादा फिसल गई होगी…

रहते नहीं मिजाज़ मेरे, हमेशा एक जैसे ‘वीर’,
नाज़ुक सी तबीयत उनकी, फिर बिगड़ गई होगी|
जुबां आखिर जुबां है, बेइरादा फिसल गई होगी…

हर सितम पर कुछ कहना, फितरत नहीं ‘वीर’ की,
ज़ख्म नया था दिल का, एक आह निकल गई होगी|

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