आँखें खोल कर देख!

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ज़हन से ख्याल झाड़ कर देख,
डर्र की आँख में झाँक कर देख|

जिंदिगी से खुद को मांग कर देख,
अपने वजूद को पहचान कर देख|

लम्हे को कभी बाँध कर देख,
वक़्त के दरिये को थाम कर देख|

हदों की सरहद को लांघ कर देख,
हिम्मत को सर पर बाँध कर देख|

खुद को सवालों से निकाल कर देख,
चिंताओं को कल पर टाल कर देख|

ख्वाइशों के तारों को बुझा कर देख,
हसरतों के अब्र को गला कर देख|

ज़रूरतों से आगे ज़रा जा कर देख,
खुशियों से परे कुछ पा कर देख|

एक दिन को मज़हब भुला कर देख,
अपने अंदर खुदा को बुला कर देख|

जिम्मेदारियों की जंजीर तोड़ कर देख,
तू खुद अपने से रिश्ता जोड़ कर देख|

आँखों से अश्क बहा कर देख,
गम की इन्तिहा तक जा कर देख|

गड़े मुर्दों को उखाड़ कर देख,
माज़ी के पन्नों को फाड़ कर देख|

समाज के नज़रिये को हटा कर देख,
तू आँखों को दुनिया पर गाड़ कर देख|

आँखें खोल कर देख!

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  • Santosh Gupta

    देखा है मैने भी समाज के नजरिये को तोड़कर ,
    खुद के लिए जीकर , हर पल ..

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