बहते बहते

कह दे के देर ना हो जाए कहते-कहते,
ये किनारा भी न छूट जाए बहते-बहते|

फिर ज़ख्म खाने की आदत हो जाएगी,
गर यूँ ही खामोश रहा तू सहते-सहते|
ये किनारा भी न छूट जाए बहते-बहते…

हुनर नहीं बस नवाज़ा है खुदा ने,
लिखता हूँ ख्याल अपने यूँ ही बैठे-बैठे|
ये किनारा भी न छूट जाए बहते-बहते…

मुझे गिराना नामुमकिन तो नहीं था ‘वीर’,
मगर एक उम्र लगी मुझे ढ़हते-ढ़हते|

बहते बहते
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