कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ

kabhi-zehan-kabhi-dil-kabhi-ruh

हर दिन अपने लिए एक जाल बुनता हूँ,
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ|

हर रोज़ इम्तिहान लेती है जिंदिगी,
हर रोज़ मगर मैं मोहब्बत चुनता हूँ|
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हू…

बहुत दूर चला आया हूँ कारवाँ से,
तन्हा रास्तों में एक हमसफ़र ढूंढता हूँ|
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…

अंधेरों में तुम्हारा चेहरा साफ़ दिखता है,
तुम सामने होते हो जब आँख मूंदता हूँ|
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…

सिर्फ एहसास ए मोहब्बत बन जाता हूँ,
जब तेरी ज़बीं को मैं चूमता हूँ|
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…

तेरे होते हुए सुखन मुमकिन नहीं,
तेरे जाते ही अपनी कलम ढूंढता हूँ|
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…

सब हैरान हैं देख कर रक्स ए इश्क,
मैं तेरी वफ़ा में ऐसा झूमता हूँ|
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…

दिल में आशियाने की आरजू लिए,
मैं शहरों शहरों घूमता हूँ|
कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ…

3.75 avg. rating (75% score) - 4 votes
%d bloggers like this: