सावन मेरे

लौटे नहीं हैं परदेस से साजन मेरे,
तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे|

अब आये हो तो दर पर ही रुकना,
पांव ना  रखना तुम आँगन मेरे|
तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे…

तेरी ये गडगडाहट, तेरी ये अंगडाईयां,
इनसे मुख्तलिफ नहीं हैं मेरी तन्हाईयां,
चाहे तो बहा ले कुछ आंसूं दामन मेरे|
तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे…

तेरी बूंदों से मेरी तिशनगी ना मिटेगी,
तेरी कोशिशों से ये आग और बढ़ेगी|
तुझसे ना संभलेंगे तन मन मेरे|
तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे…

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  • raghulaughter

    वीर जी सावन पर एक सुन्दर रचना व्यक्त की है आपने

    वाह वीर वाह

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