बज़्म ए ख्याल – 1

तुम सच हो ये मेरा गुमान ही सही,
मैं झूट हूँ ये तेरा ईमान ही सही|

मैं अपने लफ़्ज़ों का हिसाब लगता हूँ,
चंद ही हैं इन ख्यालों की भीड़ में|

अंधेरों से झूझता हूँ, तो सवेरे नाराज़ हो जाते हैं,
क्या कीमत दूं तुझे ए नींद बता|

कुछ गुज़र कर भी बाकी है, कुछ ‘काश’ में लिपटा है|
कुछ ‘क्यों’ में बंधा है, कुछ ‘क्यों नहीं’ में सिमटा है|

गमों की भी तासीर तेरे जैसी है,
जवान हो रहें हैं उम्र के साथ|

अँधेरे रास्तों को तुम्हारा नूर बर्दाश्त नहीं,
बदला लेते हैं मुझसे तेरे जाने के बाद|

अब जिंदगी को कसूरवार ना कहिये,
उसकी कोई मजबूरी रही होगी|

तुम बदले और मैं भी बदला ‘वीर’,
कैसा हादसा दोनों के साथ हुआ|

फिर ज़ख्म लिए फिरते हैं गलियों-गलियों,
चारागर से बेर बहूत महंगा पड़ा ‘वीर’|

पल पल का हिसाब जोड़ा.. फिर भी जिंदगी ना मिली|
जाने क्या अदा है इसकी तुझमें घुल जाने की|

उनसे क़ैद ए मोहब्बत न देखी गयी,
तो ज़माने ने इसे सूली पर लटका दिया|

अब महफिलों से लो उठ चले हम,
सुना है कोई नया दर्द घर आया है|

लपेट कर सोया तो हूँ यादों को..
पर इन्हें बहूत कुछ सीखना है तुमसे अभी|

बंद ताले सा हर शख्स अपनी कड़ी से लटका है..
ना ही अन्दर जाता है और ना बहार ही आता है|

अब कलाम मुश्किल हो रहा है ‘वीर’,
किस सिरे से इसे पकडूं, किस गठन से इसे उठाएं|

वो चटका हुआ आईना तुझसे नज़र ना मिला पाया,
देखा है उसने मुझे कई टुकड़ों में बटते हुए|

खाली घर नहीं है तेरे जाने के बाद,
लम्हें उठा रहा हूँ हर कोने से मैं|

महंगी नहीं है ख्वाबों की तामीर ‘वीर’,
बस एक जिंदगी की कमी है|

चुभते रहे मेरी आँखों को देर तलक,
ओस से वो अश्क जो तुमने पलकों में छुपाये थे|

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