बज़्म ए ख्याल – 10

चंद रंगों में सिमटी है तस्वीर हसरतों की,
कुछ तेरे चेहरे की हैं, कुछ मेरी आरजू की|

कहाँ ले जायेगा ये सफ़र अब मुझे ‘वीर’,
हर मील के पत्थर पर मंजिल कोई नयी लिखी है|

कहीं बादलों में ही है मेरा आशियाना ‘वीर’,
ये ज़मीन की हकीकत बेगानी सी लगती है|

पिंजरा ही ले उड़ा वो थका हुआ पंछी ‘वीर’,
आखिर कब-तलक सलाखों से हौसला रुकता|

हर आईने में कोई ना कोई अक्स ज़रूर है ‘वीर’,
मगर हर अक्स का सिर्फ एक ही आईना हो, ज़रूरी नहीं|

अंदाजा तो पहले ही हो जाता है मुझे तेरे वार का,
फिर भी चला जाता हूँ उसी रास्ते पर फना होने के लिए|

कुर्बत की गर्मी जो ना मिली इस मरासिम को ‘वीर’,
पत्थर सी हो जाएगी इस दिल की तासीर देखना|

एक दीवार बना रहा हूँ अपने चारो ओर ‘वीर’,
चुनवा दूंगा ये आवाज़ जो सिसकी बन के रह गयी है|

इजाज़त कब मांगी थी तुझे अपना कहने के लिए ‘वीर’,
ये हक मेरी मोहब्बत ने दिया है मुझे|

मैं कोई शय तो नहीं एक दिल हूँ ‘वीर’,
मुझे हासिल करना ज़रूरी नहीं है सँवारने के लिए|

अपनों के लिए तुने सारी जिंदगी गुज़ार दी ‘वीर’,
अब पूछता है अपना हासिल आखिरी लम्हों में क्यों|

इश्क भी हुआ और मोहब्बत भी मिली ‘वीर’,
अब कुछ मांगने को बचा क्या है खुदा से|

जवाब तो मालूम था मुझे भी अपने हर सवाल का,
मेरी जुस्तजू थी के तुझे करार मिले इजहार से|

क्या कुछ न किया मोहब्बत के लिए हमने ‘वीर’,
मगर मुमकिन न हो पाया जिंदगी सँवारना हम से|

अन्दर ही रख लूं तो, ईमानदारी बुरा मान जाती है,
कुछ गर कह दूं तो, उसकी आंख भर आती है|

थी तो एक बात तुम्हें बताने की,
मगर हमने आज़मा ली अदा, गम छुपाने की|

देख तेरे किये पर, कैसे क़दमों तले कुचला गया ‘वीर’,
तेरा ही दिल हूँ, मुझे थोड़ी इज़्ज़त दिया कर|

जिंदगी हो तो जाया भी कर दूं ‘वीर’,
ज़रा सी मोहलत का हिसाब क्या रखूँ|

शिकन भी आयी नहीं ज़बीं पर उसके ‘वीर’,
हमने रोका ज़रूर जाती हुई आखिरी सांस को|

तुझसे ज़रूरी भी कुछ है मेरे पास ‘वीर’,
यूँ उम्मीद ना रखा कर हर वक़्त गुफ़्तगू की|

एक तरफ बीती जा रही है क़ज़ा की मोहलत ‘वीर’,
दूसरी ओर गम-ए-हस्ती तुझे जीने भी नहीं देता|

जिस्म ने बाँध रखा है रूह को ‘वीर’,
वरना किसे नहीं पता अपने घर का रास्ता|

बयां अपने हाल का तैयार है ‘वीर’,
अब वो शख्स ढूंढ जो फिक्रमंद हो|

इतनी आग का और क्या मैं करता ‘वीर’,
जलाता रहा चुन-चुन कर हर्फ कागज पर|

मायूस क्या हुआ ‘वीर’ दुनिया की नियत ही बदल गयी,
सबने ढूंढ लिए हैं खंजर मेरे नाम के|

वो परी जिसको दादी रात में बुलाया करती थी,
लौटकर आ ना सकी, मेरा बचपन गुज़र जाने के बाद|

खैर ये तो होना ही था कभी ना कभी ‘वीर’,
कब-तलक तुम आँख ना खोलते, ख्वाब टूटने के डर से|

मोहब्बत में मिली जिंदगी यूँ ज़ाया हो गयी ‘वीर’,
बदलते हालातों ने मजबूर रखा हम दोनों को|

लम्हों को जोड़ कर जिंदगी बनाने की कोशिश तो है ‘वीर’,
मगर इनकी दरारों में खलिश रह ही जाएगी हसरतों की|

जितना भी तू चाहे समेट ले मुझे आँखों में ‘वीर’,
कुछ अरसे में धुंदला ही जाएंगी तमाम तस्वीरें|

ज़ुल्फ़ नहीं तो बोतल ही खोल लूं ‘वीर’,
मेरी जिद है आज अपना होश गवाने की|

दिलकश है इस फिराक का हर आलम ‘वीर’,
लम्हा-लम्हा महक रहा है उसके ख्याल से|

ज़रा संभल कर रहना महफिल में आज ‘वीर’,
चंद हाथों में देखे हैं हमने गुलाब काँटों वाले|

कैसे बाँट लेते है खुद को जिंदगियों में लोग,
एक दिल में ही रख लेते हैं ईमान जुदा-जुदा|

एक नज़र में तुमने क्या-क्या ना कहा,
हमने एक उम्र बिता दी मोहब्बत समझने में|

तेरी दुनिया में नाम बनकर रह गया ‘वीर’,
मुझे उम्मीदें थी अपने किरदार से और भी|

चल कर चार कदम तेरे बिन अहसास हुआ,
यूँ अकेले भी मुमकिन थी जिंदगी ‘वीर’|

तेरा गिला क्या है जिंदगी से मुझे बता,
क्यों उदासी छोडती नहीं है तेरा ज़हन|

बरसों बाद लौटा हूँ इस ज़मीन को ‘वीर’,
हैरान हूँ बदला हुआ मंजर देख कर|

मेरी खुशी में काश तेरी खुशी भी शामिल होती,
अब अधूरी सी लगती है, अपने दिल की हर ख्वाहिश तेरे बिन|

अपनी कोशिश को उसका इम्तहान ना बना,
तू ने हारा है खुद को कई बार पहले भी|

मुरझाया रहता है अब कई रोज़ वो गुल ‘वीर’,
तुझे ज़रुरत क्या थी उसे हाथ लगाने की|

उलफत का सबब क्यों पूछता है ‘वीर’,
जज़्बातों को दूर ही रख सवालों के घेरे से|

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