बज़्म ए ख्याल – 11

मोहब्बत करते-करते तू बंदगी कर बैठा है,
करीब आते-आते तू खुद को खो बैठा है|

जब तलक बेपरवाह था ठीक ही था,
अब सोचता है मुझे, तो मजबूरी की तरह|

वो पहले सा हौसला ‘वीर’ में नहीं,
घुटने टेक देता है अब जिंदगी के आगे वो|

उलटे पांव ना चल सका जज़्बातों का मुसाफिर,
जाने किन गलियों से पहुँचा मैं इस मंज़र को|

सोचता तो हूँ जाहिर करूँ शिकवे तुमसे,
लेकिन रोक लेती है मुझे मोहब्बत बार-बार|

कद्र-ए-वीर आसान नहीं हमनफस,
उसे गिला दिल में रखने की आदत है|

हमारे परदे पर यूँ आंखें ना दिखा,
हिजाब उठाया तो, तुम्हें आईना देखना पड़ेगा|

चल उठ के अब कारोबार-ए-दुनिया भी कर लें,
रोटी भी ज़रूरी है भूख लगने पर|

दिन की तिशनगी शाम तक संभाल ले,
हम पीयेंगे फिर प्यास लगने तलक|

लफ़्ज़ों की पर्दादारी हमें मंजूर है,
ग़ज़ल करीब होकर भी कागज़ से दूर है|
सिर्फ लफ़्ज़ों की कड़ी नहीं ग़जल,
अहसासों से लिपटा जज़्बातों का नूर है|

अपनी खुदी को बिखरता देख तुम कुछ क्यों ना बोले ‘वीर’,
अब उसकी फितरत बन गयी है तेरा दिल दुखाने की|

सुबह की नर्म धूप में नहा कर निकले हैं,
दिल में तस्वीर-ए-जाना छुपा कर निकले हैं|

जब आँख भर आये तो मुस्कुरा दिया कर,
गुमान रहे सबको तेरी खुशमिजाज़ी का|

‘क्यों’ के सवाल से डर ही लगता है ‘वीर’,
चल इल्जाम किस्मत को देते हैं, रिश्तों को नहीं|

कोहरा है मेरी यादों की तस्वीरों पर,
धुंदला गयी है हर बीती बात क्यों?

पीना भी छुट जायेगा एक दिन ‘वीर’,
तू पहले छोड़ दे उस सहर की उम्मीद|

आंखें मूंद लूं तो चौका देती है मुझे,
एक ख़ामोशी जो गूंजती है तन्हा ज़हन में|

कुछ इल्जाम ले अपने सर पर भी जिंदगी,
मैं मुजरिम नहीं हूँ हर दाग का तेरे|

कहीं निकल जा इस कोहराम से दूर ‘वीर’,
ये बवाल थमने का नहीं तेरे रहते|

कैसा मायूस सा दिन है आज,
आया है रात का कालापन लिए|

गिलों को बंद तालों में रखना चाहा हमने,
उफन के निकले सब, ज़हन की क़ैद से अचानक|

शोर तो यूँ ही बरपेगा जिंदगी में ‘वीर’,
खुद को सुनना आसान ना होगा|

खामोश टूटने की अदा जाती रही ‘वीर’,
अब आह निकल आती है दरारों के साथ|

मैं नहीं रहा वो शख्स जो हुआ करता था,
तू शाम-ओ-सहर जिससे मिलने की दुआ करता था|

मेरा शहर भी है कब से मेरी आस लगाये,
कुछ दिन के ही लिए सही, वो ज़माना वापस आये|

हम से ना पूछ सही-गलत के मायने,
हम ने दिल को ही अपना ईमान माना है|

हर सांस-सांस वक़्त की तंगी है ‘वीर’,
तू रहने ही दे आरजू आवारगी की|

उठती तो हैं कितनी लहरें वफ़ा की ‘वीर’,
चंद ही हैं जिन्हें जिंदगी का साहिल मिला|

एक दीवाने की कोशिश को देख क्या-क्या हासिल मिले,
तुझे लफ़्ज़ों में पिरो लूं तो दाद-ए-महफ़िल मिले|

इजाज़त लेकर कब बहते हैं अश्क ‘वीर’,
इनसे अदब की उम्मीद बेमानी है|

एक ग़ज़ल मैं, खुद को भी नज़र कर लूं,
कोशिश तो की थी मगर, कामयाब ना हुआ|

उसको तेरा ख्याल नहीं ये गिला जायज़ होता ‘वीर’ ,
गर तुमने सिर्फ मोहब्बत की होती, बंदगी नहीं|

आज ईमान मेरा थोड़ा खराब है,
आँखों में है वो और हाथों में शराब है|

गम छुपाने का हुनर अभी सीखना है ‘वीर’,
उसकी एक नज़र में ही उतर जाती है सारी पर्दादारी|

ना हम से हुई कोई बात यहाँ वहां की ‘वीर’,
वो झांकता रहा मेरे बंद दरवाज़ों के पार|

किस्सा कुछ अजीब है और इसका सिरा पकड़ना मुश्किल,
वो आया और ज़हन में उतरता चला गया|

जब स्याही फीकी हो जाएगी,
जब रात शाम पर रो जाएगी|
फिर मैं अँधेरा सजाऊंगा,
जिंदगी ख्वाब में खो जाएगी|

यूँ ही सलामत रहे दुनिया मेरे बिन ‘वीर’,
मैं अपना जहान बनता रहा एक-एक ख्याल पिरो कर|

अब ख़ामोशी और ख्याल की दोस्ती हुई ‘वीर’,
देख दोनों ने रंग दिया है ज़हन तेरा|

उसने पलटकर देखा और जिंदगी ने रास्ता मोड़ लिया,
वरना जाता था ‘वीर’ खंजर लिए, उस कातिल को|

उखड़ा हुआ फिरता है गलियों में,
क्या बिछड़ा है जिसे ढूंढता है तू|

घूमता फिरता है वक़्त ‘वीर’,
पर जिंदगी क्यों थमी हुई है|

कोई खुमारी है हवाओं में ‘वीर’,
महक जाती रही सादगी की इस से|

कुछ तो रंजिश है हमारी खुशी से,
हम को लगती क्यों नहीं अपनी सी ये|

रो लेना फिर फुर्सत में कभी ‘वीर’,
अभी वक़्त है और ज़ख्म खाने का|

वक़्त करवट बदल रहा है,
तू अपने जुनून को हवा दे|
इससे पहले तुझे खाक करे,
अपनी आग से शोला बुझा दे|

कल की बातें क्यों करता है ‘वीर’,
बार-बार एक ही मौत क्यों मरता है ‘वीर’|

मुझको तेरे मातम का सबब मालूम है हमनफस,
देखता हूँ रोज़ एक लाश अपने आईने में|

मैं खामोश रहा, मुझे आपकी उम्र का लिहाज था,
मुझे गम आपकी नादानी का नहीं, अफसोस अपने रिश्ते पर है|

भागते शहर में,
जिंदगी छुपाने की कोशिश है|
तू इसकी रफ़्तार पर ना जा,
देख थमा हुआ है हर शख्स यहाँ|

खोकले घरों की ऊंची दीवारें होती हैं ‘वीर’,
अपने डर को छुपाना उन बाशिंदों की मजबूरी है|

इस सहरा में तलाश का कोई सिरा नहीं ‘वीर’,
ढूँढता है एक बादल तुझे पिघलने के लिए|

छलकना सीखा नहीं है इन्होंने अब तलक,
उसकी आंखें भी हैं मेरे पैमाने जैसी|

पर्दा उठाते हुए डरता हूँ मैं ‘वीर’,
मेरे अक्स में उसकी परछाई ना कोई देख ले|

मुझ पर इलजाम है के मैं लिखता हूँ लोगों के लिए,
ये बात और है की तन्हा ही रहती है महफिल अपनी|

दो कदम का ही फासला है वीर,
एक उसका और एक तेरा अपने दिल से|

क्यों सूरत-ए-जिंदगी तुझ को बहलाती नहीं,
कहीं तो जाती लगती है मगर कहीं जाती नहीं|

रास्तों को मंजिल से जुदा कर के देख,
उनमें खो जाने का अपना लुत्फ़ है|

खूशबू है उन लम्हों की आस-पास ‘वीर’,
महक रहा है गुलों सा ज़हन मेरा|

मुस्कुराते रहने का हुनर ना आया हमें उम्र भर,
चंद रिश्तों ने बार-बार रुलाया हमें उम्र भर|

तह लगा कर कपड़ों से, अलमारी में रख क्यों नहीं देते..
ये क्या बात है ‘वीर’, तुम वही ज़ख्म पहन कर रोज़ निकलते हो|

खैर डूबने की फितरत ही है तुम्हारी ‘वीर’,
चाहे दरिया-ए-मोहब्बत हो या समंदर दर्द का|

डूबता सूरज लाल चादर ओढ़ कर सोने को है,
कुछ और देर बस ‘वीर’, फिर शाम होने को है|
फिर काले सायों में परछाई खो जाएगी…

हम आपके अनगिनत एहसानों का क़र्ज़ उतारते हैं,
खून के रिश्ते ही अक्सर खून के आँसू रुलाते हैं|

धड़कते दिल का सबब सीधा साधा है ‘वीर’,
या वो निगाहों में है या बाँहों में मेरी|

आज फिर भागना है मुझे दिन भर ‘वीर’,
आज फिर शाम को यहीं खड़ा मिलूंगा|

मेरे बयाने-ए-इन्तहा का सिला तो सुनिए,
उसने ज़िक्र किया किसी और की बेवफाई का|

कितना आसान है जिंदगी सुलझाना ‘वीर’,
लफ़्ज़ों में लिख दे, दर्द मूंह से बयां ना कर|

और जन्नत बन जाएगी की अपनी दुनिया भी ‘वीर’,
ये बात और है के तुझे पहचान ने वाला कोई ना होगा|

अन्दर-अन्दर जीने की सज़ा तो सबको मिली है ‘वीर’,
मेरी जुस्तजू थी तुम्हें अपनी दुनिया दिखाने की|

फिर ना कहना के अजनबी सा लगता है ‘वीर’,
आईने पहन रहा है तेरी सहूलियत के लिए|

तुमसे गर छुपा लिया खुद को तो रिश्ता ज़रूर संभल जायेगा,
मगर क्या ‘वीर’ का ज़हन इस पर्दादारी से बदल जायेगा?

शाम की कालिख ज़हन में लगाकर, सोचते हैं…
शायद रास्ता भूल जाएगी तेरी याद, रात आते आते|

भागता हूँ तो साये सा पीछे आता है,
क्यों जुदा नहीं होता इस दिल से तेरा दर्द|

पा कर खो देना दिल को मंजूर कैसे हो,
या कबूल कर मेरी दुआ या मुझे काफिर ही बना दे|

कोई इस शहर को समझाये थोड़ा अदब ‘वीर’,
अजनबी सा रोज़ मिलता है मुझसे भेस बदलकर|

मुझे संवारने की उसकी इल्तिजा कितनी मासूम है ‘वीर’,
गौर करूँ के जाने दूं दुआ समझ कर|

ख्याल और जज़्बात ने हकीकत की सरहदें मिटा दी ‘वीर’,
कुछ होकर भी ना हुआ और कुछ ना होकर भी गुज़र गया|

हर सहर नींद ऐसे ही खुलती है ‘वीर’,
मानो कोई हादसा हुआ हो आस पास|

जो तुमने चाहा था मिला है वही तुझे ‘वीर’,
मोहब्बत जिंदगी हुई और बंदगी जिंदगी|

मैंने तेरी खुशी को ही जिंदगी समझ लिया था,
हैं और भी मंजिलें तेरे अलावा ‘वीर’|

ये किस्मत का खेल भी अजब है ‘वीर’,
कभी बद्दुआ लगती है तो कभी इनायत|

मेरा आईना बन गए हैं ख्याल तेरे,
देख रहा हूँ खुद को अलग नज़र से मैं|

खुशनसीब हूँ मैं,
मुझे खुदा ने तुझसे नवाज़ा है,
बीच तूफान में भी,
तुझे सहरा की प्यास का अंदाजा है|

थोड़ा पेचीदा है जिंदगी का फ़साना ‘वीर’,
एक उम्र की फुरसत चाहिए, अपना किरदार समझने के लिए|

अब समझे अपने दिल की बनावट ‘वीर’,
नाज़ुक फितरत में घुली थोड़ी दीवानगी है|

मुनासिब होता गर पलट कर देखा ना होता ‘वीर’,
खोल दिए हैं तुमने कई ज़ख्म सिले हुए|

किसने तेरे चेहरे से वो हँसी चुराई है,
आग गुलशन में शायद बागबान ने ही लगाई है|

किरदार जिसकी बगावत का चर्चा शहर में हुआ,
मुझे लगा मेरे जैसे ही सताया हुआ|

इन रास्तों पर खड़ा मायूस होता हूँ ‘वीर’,
रफ्तार इनकी है या ठहराव मेरी जिंदगी का|

मैं क्या कहूं तुझसे की हुआ क्या है मुझे,
अलफ़ाज़ मिलते नहीं इस मंज़र को बयां करने वाले|

अपने ही किरदार को निभाना मुश्किल हो गया ‘वीर’,
दूर खुद से होना इतना भी आसान ना था|

सबको तलाश है अपनी जिंदगी की,
कोई हमसफ़र ढूंढता है कोई तनहाई|

अक्स सा कैद हूँ जिंदगी के आईने में ‘वीर’,
ख्वाब देख तो सकता हूँ मगर छु सकता नहीं|

जुर्म अपना लो कबूल करते हैं ‘वीर’,
हमने निभाया है अपना किरदार पूरी ईमानदारी से|

देख कर हमें कौन कह सकता है ‘वीर’,
कभी इन पर मुफ़लिसी का बोझ भी था|

सब कुछ मुमकिन था उस दौर-ए-जवानी में,
लेकिन हम उलझ के रह गए किसी और की कहानी में|

मैंने वादे तो कई किये थे ज़िन्दगी से ‘वीर’,
वक़्त गुज़रता गया और हम बेवफा होते रहे|

पांव के छालों से घबराना कैसा ‘वीर’,
मंजिल दूर है तो सफ़र लम्बा ही होगा|

कुछ और भी थी हम में खूबियाँ मुद्दत पहले,
अब सिर्फ लफ़्ज़ों तक सीमित है कलाकारी अपनी|

बयां-ए-दर्द इतना मुश्किल है ‘वीर’,
हर्फ़-हर्फ़ निकला है एक सिसकी के बाद|

मुमकिन है इस उम्र में तुम तड़पते ही रहो ‘वीर’,
मुमकिन है उसने जिंदिगी एक और तामीर की हो तेरे लिए|

मुझे भूलने की अदा गर आती होती,
मैं भूल चुका होता अपने खून का रंग|

याद है मुझे वो मुफलिसी का दिन आज भी ‘वीर’,
मेरी कलम को कागज़ तक नसीब ना हुआ था|

मंसूबे जाहिर तो कर दिए थे उसने पहले से,
हाथ में खंजर लेकर मुझसे गले मिला था|

चार दोस्तों की अजीब सी कहानी है,
निकले थे सब साथ-साथ जुदा मंजिल को|

थक हार के दिन तो ढल गया ‘वीर’,
उसका नूर भी दिखा ना पाया रास्ता हमें|

शाम के धुंधले साए जब रात के अंधेरों से टकराने लगे,
हम भी अपना चेहरा छुपाये घर को जाने लगे|

भागती हुई मंजिलों से ज़रा पूछो तो ‘वीर’,
क्यों न मिला उनको अपना तलबगार कोई|

तुझको गर नज़र आ सकती मेरी तन्हाइयाँ,
देख पाता तू अपना चेहरा इनमें|

अब के सवान ऐसे भी अश्क बहा लेना ‘वीर’,
साल भर ढूंढते रहे जो आसरा दामन का|

तिजोरियों में बंद नहीं है सिर्फ दौलत उनकी ‘वीर’,
वो अपना सुकून वहां गिरवी रख कर आये हैं|

चंद सिक्कों से हलकी है रिश्तों की डोर ‘वीर’,
इंसानों की कद्र करना जाने कब आएगा लोगों को|

मैंने रंग भी भर कर देखे हैं आईने मैं,
मगर चेहरा अपना मुरझाया ही रहा ‘वीर’|

हर शाम लिखते तो हो अपनी जुस्तजू ‘वीर’,
क्यों खो जाती है सारी कोशिश सहर होने तक|

थोड़ी मोहब्बत से भी जिंदगी गुज़ार लेते ‘वीर’,
तुमने हवा क्यों दी सिर्फ दर्द की चिंगारियों को|

इस खलिश का सबब तो ज़ाहिर है मुझे ‘वीर’,
तेरे ज़बीं पर अरसे से उसकी उँगलियाँ जुदा है|

वक़्त कम ही है तेरे पास मेरे ‘वीर’,
आरजू में गुज़ार ले या दर्द की सिसकी में|

मिले जो चंद लम्हे हैं साथ अपने,
कहीं गुज़र ना जायें परछाइयों में|

अब रुक के देखले बात बीती हुई,
अब दर्द जम गया है बहते-बहते|

ऐसे भी गुज़रे हैं दिन कई ‘वीर’,
जिनका ताल्लुक नहीं था तेरे फ़साने से|

गर रिश्ता सिर्फ एहसानों का ही हो ‘वीर’,
काफी है अगर लोग अपना ईमान पाक रखें|

वो जो हो ना सका उसका मलाल ना कर ‘वीर’,
ख्वाब को ही जी ले जिंदगी समझकर.. अब और सवाल ना कर ‘वीर’|

एक अधूरी किताब ही तो है जिंदगी ‘वीर’,
एक सफा तू लिख एक सफा पलटने के बाद|

दुख में छुपा हुआ कोई सुख भी होता है,
हर तस्वीर का दूसरा रुख भी होता है|

खुशियों से तेरा दमन भर दूं,
आ एक जिंदगी तेरे नाम कर दूं|
ख़त्म ना हो हश्र तक ये सिलसिला,
आ इस सफर को ही अंजाम कर दूं|

किस मंजिल को जाती है ये गुमराह जिंदगियां,
सारा कारवाँ पूछता है मसीहा कौन है|

आंखें भर आई, अपना ही कसूर है,
उसने तो बात ज़माने सी कही थी|

यूँ सादा दिली से ना दे ज़ख्म मुझे,
कई रोज़ गुज़र जाते हैं इख्तियार-ए-‘वीर’ में|

सरगोशी-ए-हवा में भी ग़ज़ल है ‘वीर’,
नाम उसका गुनगुनाती है तुझे छूकर|

मेरी रज़ा की अहमियत ही क्या है ‘वीर’,
तू करेगा वही जो मोहब्बत तुझसे करायेगी|

बयां ए बेखुदी से डरता हूँ अब ‘वीर’,
उसने गहराई देखी तो उभर ना पायेगा कभी|

इस दुनिया ने, बाद मुद्दत बड़े नसीब से देखा है,
हमसे ना पूछिए, हमने तो माहताब और भी करीब से देखा है|

कुछ कच्चे से रंग हैं उतर ही जायेंगे ‘वीर’,
फिर चेहरा अपना किस तरह छुपाओगे आईने से|

रंग-ए-इंतज़ार का लुत्फ़ क्या कहिये,
गहराता जाए हर लम्हा-लम्हा ये|

जुनून मेरा ऐसे लगा दामन पर उसके,
के आशिक हुआ हुस्न वालों का रंग आज|

होली दबे पांव से आई और खामोश ही चली जाएगी,
देख के बवाल सारा उससे कुछ ना कहा गया|

इस बेगाने से शहर में कब होली नहीं होती ‘वीर’,
देख हर शख्स के चेहरे पर रंग किसी और का है|

सज़ा होती तो मंजूर थी मुझे ‘वीर’,
वो दे गया मुझे जिंदगी तोहफे में|

लौट के जाना मुश्किल है, तो आगे चलने का हौसला रख,
ना मिले ख्वाबों का महल, मगर सर पर एक छत्त तो हो|

भागते रहोगे कब तलक खुदसे ‘वीर’,
यूँ ही नहीं बदलेंगे तेरे ज़हन के रंग|

उम्मीद का मारा इखलास का प्यासा हूँ,
अब इस मायूस दिल का मैं ही दिलासा हूँ|

करके कबूल उसे दर्द बना ले ‘वीर’,
बेरुखी से सच कब तलक छुपायेगा|

क्यों कुरेदता है खोखले रिश्तों को तू ‘वी’र,
हाथ ना आएगा कुछ तेरे एक खलिश के सिवा|

मैं टूटा हूँ तो दरारें उसमे आ जाती हैं,
मोहब्बत की ये इन्तहा हमने कब मांगी थी|

तुम उम्मीद करो रिश्तों से क्यों ‘वीर’,
जिंदगी अपनी बने क्यों मुसीबत किसी और की|

फैसले फिर से कर लूं अपनी कीमत के,
बड़े सस्ते में बेंच रहा है वक़्त मुझको|

झुकाना मुझे इतना आसान भी नहीं सितमगर,
हम को वापस उठ खड़े हो जाने का हुनर है|

तन्हाई हालात नहीं हुनर है जिंदगी का,
इसमें डूबता जा और किसी को आवाज़ ना दे|

अपनी जुस्तजू अपना ज़हन है यहाँ,
ना बयां कर, ना ज़ाहिर हो तेरी कशमकश|

खामोश रहकर जीना सीख ले,
ज़हर को अकेले पीना सीख ले|

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