बज़्म ए ख्याल – 12

ऐसा है अपनी फिराक का फ़साना ‘वीर’,
सच पूछो तो हम को इंतजार-ए-विसाल नहीं|

उम्मीद मैंने भी छोड़ दी है ‘वीर’,
गर तुझे अपने हौसलों पर एतबार नहीं|

तुम्हारे दिल का सुकून, मेरे इख्तियार में नहीं,
शरमिंदा हूँ के असर इतना, मेरे प्यार में नहीं|

मेरा हौसला जब चुभने लगा उन आँखों को ‘वीर’,
हमने छोड़ दी सारी कोशिशें उभरने की|

बेताबी तो देखिए सौदे से दिल की ‘वीर’,
एक शम्मा में दिख रहा है पूरा आफताब इसे|

मैं लम्हें यूँ ही कलम करता हूँ ‘वीर’,
कभी फुरसत में पिरो लूंगा जिंदगी इन से|

जो धुंधला सा था ज़हन में कल तलक,
आज वो साफ़ है आँखों में तस्वीर की तरह|

लौट के आये वो ज़माना गर कभी ‘वी’र,
पूछेंगे उससे अपने चेहरे की लकीरों का सबब|

एक और फ़साना भी है इस छोटी सी कहानी में,
तुम पढ़ सको तो पढ़ लो लफ़्ज़ों के दरमियाँ|

मुझको कब हसरत थी सब हासिल करने की,
हर कदम-कदम बस मकाम एक नया मिला|

ये शायद मेरा वहम ही हो ‘वीर’,
के दुनिया कोई और भी है ख्वाबों की|

मुझे बिखरा रहने दे आवाज़ में अपनी,
मुझे टुकड़ों में हासिल है अपनी खुदी|

मुझे नज़र का फरेब भी हकीकत लगता है,
गर है ये ख्वाब तो नींद ना टूटे कभी|

ये शौक की सरगोशियाँ फिर कब लौटे ‘वीर’,
हर लम्हें में कोई निशानी रख दे बेखुदी की|

ना बदलेगा कुछ तेरे चाहने भर से यहाँ ‘वीर’,
वक़्त कितना और चाहिए तुझे रिश्ते समझने के लिए|

नज़र फेर ले हर उस शय से ‘वीर’,
जो ले जाती हो तुझे उन अंधेरों में|

रौशनी इतनी ही कर के आँखों में समा सके ‘वीर’,
संभल कर रख अपना नूर काली रात के लिए|

अब के बहार कोई गुल ना रहे मायूस ‘वीर’,
हर गुल को उसके हिस्से की जवानी मिले|

तस्वीर के हुनर का कायल है ‘वीर’,
बोलती है इतना कुछ बिना लब खोले|

बादल उस साहिल की इबादत का असर है ‘वीर’,
जो मांगता रहा समंदर अपनी दुआओं में|

बूँद बूँद गिरकर आईना हो गयी,
ज़र्रे-ज़र्रे में दिखाई देता है तेरा अक्स ‘वीर’|

खिलने का मौसम दस्तक देता है ‘वीर’,
आयी है बहार यहाँ तुझे ढूंढते हुए|

जिंदगी अधूरे से सिलसिले का नाम है,
इस दास्तान का अंजाम सोचा ना कर|
लुत्फ़ ले बेबाक होकर लहरों का,
बहते दरिया को यूँ रोका ना कर|

इस कलम से, तो सिर्फ लफ्ज़ लिख सकता हूँ ‘वीर’,
लकीरें तो पहले से ही हैं इन हाथों में|

तुम किसी और के हिस्से की जिंदगी नहीं जी सकते,
सबकी अपनी तलाश है, सबकी अपनी एक मंजिल|

डर है मुझे कहीं सब्र ना टूट जाए ‘वीर’,
फिर अंजाम क्या होगा उन चार दीवारों का|

वो मसीहा भी था और दर्द का मारा भी,
वो रोया कभी अपने, तो कभी मेरी हालत पर|

चिंगारी तो हर किसी में होती है ‘वीर’,
कम ही होते हैं मगर शोलों से जीने वाले|

पछताना गर पड़े अपनी जिंदगी पर ‘वीर’,
इससे बड़ी सज़ा क्या होगी एक उम्र गुज़रने के बाद|

जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने का हौसला, सब में नहीं होता|
मगर ज़रूरी है एक सबब का होना, हर समझौते से पहले|

हर किसी को ना दो, दिल दुखाने की इनायत ‘वीर’,
ये हक है सिर्फ तुझ को चाहने वालों का|

एक मौका तो दो, ‘वीर’ को अपनी गलती सुधारने की,
बुरी आदत है तुम्हारी गड़े मुर्दे उखाड़ ने की|

अपना हासिल समेट कर कहाँ जाते हो ‘वीर’,
अभी तो करने हैं हमें हिसाब कई पुराने|

तेरी महफिल का रिवाज भी निराला है ‘वीर’,
हर शख्स रुक जाता है कुछ कहते-कहते|

कुछ दिन यहीं पर ठहर जा जिंदगी,
मुझे सांस तो मिले अगले इम्तहान से पहले|

सोच की गहराईयों से निकल तो आये ‘वीर’,
देखते हैं कब तक रास आएगी ये दुनिया हमको|

अपने रंग से ही रंग दे इस दुनिया को तू,
बहूत हुआ तस्वीरों में रंग ढूँढने का खेल|

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