बज़्म ए ख्याल – 13

आ जाओ की देर ना हो जाये,
तुम्हें कहीं आने में|
क़ज़ा को बड़ी जल्दी है,
हमें अपना बनाने में|

अब मैं हूँ और चंद लफ्ज़ हैं,
आरजू ले गयी सबकुछ जो दरमियाँ था|

कहीं भीग ना जाए पलकों का दमन,
लो छलक जाते हैं हम उन आँखों से|

तेरी खुशबू से महक रहा हूँ,
बस गए हो मुझ में सांसों से|
क्या तलब है, क्या कशिश है ‘वीर’,
दर्द सजा रहे हैं बड़े नाज़ों से|

क्या दुश्मनी है तेरी कागज से ‘वीर’,
क्यों कुरेदता है उसे तू हर शाम|

अब नया कोई शहर लायें कहाँ से,
मशहूर हुई है अपनी दीवानगी गलियों-गलियों|

खैर किस-किस बात का मैं गवाह बनूँ,
किस्से बहूत है ज़ुल्फ में उलझे हुए|.

कहीं कुछ कभी खोया था अनजाने में,
पहचाना सा लगता है ये मंजर मुझको|

कोई मर्ज़ ही है फितरत अपनी…
रोये ज़रूर,
कभी अपने तो कभी उनके आंसूओं को|

हम भी सबके जैसे ही निकले,
गिन रहे हैं अपने कटोरे के सिक्के|

सब को बख्शा है उसने कोई ज़ख्म रुलाने को,
फिर कहते हो मुझे उसने सब ना दिया|

प्यार मिले.. उस शख्स से.. उस रिश्ते से..
प्यार है के सौदा कोई..!

मेरा दमन ना दिखा तुम्हें,
शायद मैं तुमसे पर्दा सीख ही गया|

खून जो रुलाये,
अक्सर वो रिश्ते खून के ही होते हैं…

क्यों बेरंग सी दिखती है,
क्यों मुझसे खफा है|
आरजू आज दिल से जुदा है..

कद्र करू की तुम्हें नवाज़ा है उसके साथ से खुदा ने,
वरना तनहाई को आती है जिंदगी पीने की अदा|

मैं रात का कालापन देखता हूँ,
तू सितारों की आराइश|
मैं टूटे हुआ ख्वाब गिनता हूँ,
तू दिलों की ख्वाहिश|

अब खुशी से क्या वास्ता रखें,
आती है कभी-कभी ही इस तरफ|

कोई बेरहम हमसा तो ढूंढ कर ला ‘वीर’,
देख क्या-क्या सितम किये हैं हमने दिल-ए-मजबूर पर|

लम्हा सा बना दे मुझे..
रहूँ गुज़र के भी साथ उसके|

मुश्किल है ना-मुमकिन तो नहीं,
एक दिन होसलों और फैसलों का|

निगाह मिला तो कुछ अर्ज भी करूं,
लफ्ज़ साथ ना दे पाएंगे मेरा और|

सब कुछ एक शख्स में सिमट के रह गया,
इतने रंग बख्शे मेरे इश्क ने उसे|

कुछ उलझे रिश्तों में सिसकती रह गयी,
हमने जो जिंदगी से उसका हाल पुछा|

इस घड़ी के कांटे को मुझसे शिकायत है कोई..
खिसकता नहीं है मुझे देखे बिना|

फिर कहीं रिश्तों से उम्मीद ना कर बैठे वो,
इसलिए फ़र्ज़ की चादर से प्यार ढंका है|

ये उनकी साज़िश है मुझे सताने की,
ज़हन में उबल रहे हैं लफ्ज़ कई|

कोई पूछे तो क्या कहें हाल अपना,
दूरी बहूत लफ़्ज़ों की दिल से है|

हमने देखी है तेरी नज़र से भी दुनिया,
फीके रंगों पे गुलाल तेरी सीरत के हैं|

बड़ी सादगी से उसकी नज़र ने कहा,
कितनी गहरी है एक लफ्ज़ की सदा|

दिल बहलाने की अदा उससे सीख ली हमने,
मिलते हैं मुस्कुराते हुए सबसे आजकल|

उखड़े शजर सा अपनी साँसे गिनता हूँ,
बेवफा ज़मीन को कहूं या दोष दूं हवाओं को|

लिखते-लिखते हमने एक दुआ भी मांग ली,
सलामत रहे हमारा मरासिम खलिश से|

इतनी बे-दर्दी भी जायज नहीं ‘वीर’,
काबिल-ऐ-रिहाई है ये ज़ख्म तेरे|

किस तलाश की है जुस्तजू तुझे ‘वीर’,
है नहीं कोई चेहरा इस खलिश का|

रिश्ते और भी हैं निभाने को,
कब ख्याल था इसका दीवाने को|

खुला आसमान मुँह चिडाता है मुझे,
कल तक में बादल था और वो ज़मीन मेरा|

अपनी सोच के दायरों में खुद कैद हो गए..
ख्याल बन गए हैं पहरेदार रूह के|

जो भी मुझ तक पहुँचा, रुक ना सका,
मील के पत्थर सी है किस्मत अपनी|

कोई क्या समझे इस मंजर को वीर,
रास्ता तेरा है और जिंदगी किसी और की|

पूछ रहे हैं अजनबियों से अपना नाम,
बेखुदी बहूत दूर ले आई हमें|

किसी सरगोशी की आहट थी..
क्या-क्या सोच बैठे थे हम इंतजार में..

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