बज़्म ए ख्याल – 14

अब हर सज़ा को तैयार हूँ,
जुर्म-ऐ-मोहब्बत का गुनहगार हूँ|

अब दूरियां किधर अब फासला कहाँ,
मैं कहाँ और तेरा फैसला कहाँ|
भूल जाऊं वो सारी बातें कैसे,
तू कहाँ और मेरा हौसला कहाँ|

ऐसे भी हमने वक़्त गुज़ारा है,
तेरे नाम से खुद को पुकारा है|

मुझे वो याद आया बरसों के बाद,
मैने उसे खोकर पाया बरसों के बाद|

रंग-ऐ-रुखसार खिला है,
और आँखों में नामी भी है|
वो पास बैठा है ‘वीर’,
और मुझे उसकी कमी भी है|

नज़र भी धोका देती है अक्सर हमें,
अक्स नहीं दिखता जाना पहचाना सा|

मैंने चीख कर आवाज़ अपनी जब दबाई है,
बहूत देर तलक एक सदा वापस आई है|

महफिल मैं सब दूर ही बैठे हैं ‘वीर’,
कोई जोखिम क्यों ले नज़दीक आने का|

बयान-ए-बेखुदी से छिल गया ज़ख्म पुराना,
वो आँसू छुपाता रहा अपनी दाद में ‘वीर’|

क्या है ये गर नहीं मोहब्बत ‘वीर’,
मैं रोया उसी को उसी से लिपट कर|

ये और बात के हमें तेरे गम का सबब नहीं,
हम रोये हैं तो तेरी नम आँखें देख कर|

फासला था जो दरमियाँ हट गया,
एक लम्हा दो खामोशियों में बट गया|
रास्ता लंबा था और मुश्किल भी,
तेरा साथ मिला तो सफ़र कट गया|

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