बज़्म ए ख्याल – 15

तुम्हें दिया हुआ वादा निभा रहा हूँ,
मैं टूट कर भी मुस्कुरा रहा हूँ|

क्या बात है दिन में ही जवान है बज़्म तेरी,
तेरा साथ रहे और यूँ ही महकते रहे नज़्म मेरी|

अगले सावन रोयेगा वो बादल मुझको,
बह गया है मुझसे दूर जो हवाओं में|

काश होती तुझसी मेरी भी फ़ितरत ‘वीर’,
खामोश मैं भी उसे गुनगुना लेता|

शाम भी तेरी कोई सहेली है सनम,
चिढ़ाती हैं मुझे तंज़ दे देकर|

बेरूख़ी से हक़ीक़त कहाँ बदलती है ‘वीर’,
ईद तो ईद है भले तुम चाँद का दीदार ना करो|

ये भी मुमकिन है की लौट ना सकूं कभी,
ये भी जायज़ है की तुम इंतजार ना करो|

हर लफ्ज़ की सदा हुई है सवाल सी,
चल के हो गयी है बज़्म बवाल सी|

महफिल में अकेला ही बड़बड़ाता रहा ‘वीर’,
अपना चेहरा ही देख कर घबराता रहा ‘वीर’|

सबब भी है हमें इस बेखुदी का,
रास ना आया देर तलक दामन खुशी का|

डूब भी जा ए अफताब अब,
जलाने को कुछ बचा नहीं है मेरे पास|

अजीब है शाम का रंग आज ‘वीर’,
जैसे फीकी हो गयी हो उसके हाथों की हिना|

मैं और क्या गर नहीं तेरा हम शक्ल ‘वीर’,
कितनो ने पुकारा है मुझे तेरे नाम से|

ये सब तेरी फ़ितरत के नज़ारे हैं वीर,
लोग चाँद देखते हैं तू अँधेरा रात का|

ज़ुल्म-ए-हयात के दायरे बहूत बढ़ गये,
हर शख्स नज़र आता है खुदसे बिछड़ा मुझे|

ढूंढती रही मुझे गलियों गलियों,
मैं क्या भटका, जिंदगी भी भटक गयी|

आँखें बंद क्या की दुनिया ही बदल गयी,
शीशे सी हक़ीक़त ख्वाबों से चटक गयी|

बहूत सोच समझ कर बनाई हैं हदें उसने,
मिलता उतना ही है जिसका तू काबिल है|

गम-ए-जिंदगी से बहूत कुछ हासिल है,
हर लहर से तराशता साहिल है|

अब बातों में असर नहीं है,
उसकी हम पर नज़र नहीं है|
कहीं और चलें अब ‘वीर’,
इस जहाँ में तेरा बसर नहीं है|

आँखों में तस्वीरें लिए फिरते हैं,
हम तेरी यादों की जंजीरें लिए फिरते हैं|
इन्हीं हाथों से बनाया है अपना आज,
इन्हीं हाथों में तकदीरें लिए फिरते हैं|

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