बज़्म ए ख्याल – 16

अनकही समझने की अदा जाती रही,
हमने घुटने टेक दिए लफ़्ज़ों के आगे|

यूँ तो ओढ़ रखी थी हमने चादर ज़माने वाली,
उसकी आँखों में देखा तो शरमिंदा ज़रूर हुए|

ना पूछ साहिल कैसे डूबा मैं,
तूफ़ानो की ज़िद थी और हम मगरूर रहे|

दिलों के फ़ासले दिलों को मंज़ूर हुए,
इतने करीब होकर भी हम उनसे दूर हुए|
क्या पाया राह-ए-इश्क़ में तुमने ‘वीर’,
तेरे किस्से से बेदिल भी मगरूर हुए|

बड़े नाज़ों से संभाल कर रखे हैं,
दाग जो मोहब्बत ने बख्शे हैं हमें|

मूड जाते हैं तेरे कूँचे को,
अब रास्ते भी रक़ीब हुए|
जितने दूर भी चलें फ़ासले,
हम उतने ही करीब हुए|

अब समझा क्यों हर गुल मुझ पर मेहरबान था,
तुम्हारी सादगी का उन पर भी कुछ एहसान था|

जिंदगी के मायने बदलने लगे,
हम रुके तो रास्ते चलने लगे|
शमां बुझ गयी हौसलों की ‘वीर’,
तकदीरों के दिये जलने लगे|
गरमी बहूत थी बेखुद ‘वीर’ में,
वो जला तो कई साहिल पिघलने लगे|

निशान ना रहे कोई बाकी ज़ख्मों के,
खिला ले गुल ज़हन की ज़मीन पर ‘वीर’|

सौंधी धूप पत्तों से छान के महक रही है,
मेरा कसूर नहीं है गर नियत बहक रही है|

चंद सिक्के हैं दामन का हासिल,
खो गयी है आरज़ू-ए-मोहब्बत अब|

साँस को भी मालूम है दिल की नियत ‘वीर’,
लेती नहीं है इजाज़त अब उससे|

भर गयी है इरादों की पोटली फिर से,
निकल पड़ा हूँ एक नयी तलाश में|

ज़ंजीरें बाँध तो दी हैं ‘वीर’ के पैरों में,
कैसे रोक पाएंगे उसके ख्यालों की उड़ान को|

फिर भी मैंने आंसुओं को इजाज़त नहीं दी,
सिसकते रहे वो मेरी बेवफाई में|

आज मैं रास्तों से पूछ ही बैठा,
क्यों बदलते हैं हर मौसम वो|

लफ़्ज़ों में अपनापन मिल गया मुझे,
लगते हैं मुझे तेरे जैसे ये|

खिलौने से दिल बहलाता रहा,
खून का सच झुठलाता रहा|
मैने ना देखा बार-बार उसे,
ज़ख्म साल बा साल गहराता रहा|

आपके प्यार को तरसता रहा उम्र भ.र
जाने किस-किस पर भड़कता रहा उम्र भर|
ना समझे आप मुझे मेरा होकर,
खामोश सिसकता रहा उम्र भर|

ना देखूं तो क्या मिट जाएंगे,
सवाल क्या यूँ ही सिमट जाएंगे?

ये भी क्या बिछड़ना है ‘वीर’,
मिलता है वो सौ भेस बदलकर|

किसी और की जरूरत नहीं हो,
किसी और की सहूलियत नहीं हो|
खुद में यूँ उलझा रहे ‘वीर’,
किसी और की मुसीबत नहीं हो|

लफ्ज़ लगाया करते हैं गले अक्सर,
काफी पुराना है याराना हमारा|

जब खिलो तो गुलिस्ताँ तुम्हें देखे,
जब मुरझाओ तो खबर ना हो कली को|

बेरूख़ी से यूँ परदा कर ले ‘वीर’,
नज़र आए सिर्फ़ मोहब्बत तुझे|

सबने इल्ज़ाम दे दिए हैं ‘वीर’,
चल चलें अपना हासिल लेकर|

थोड़ा बचा है मुझ में अभी इंतजार,
छीन लेगी इसे भी एक दिन बेखुदी मेरी|

ना था मैं ऐसा, मुझको भी पता है,
वक़्त के साथ बदलना भी क्या कोई खता है|

बंद है दरवाजा अकलमंदों के लिए,
मुझे जरूरत नहीं मशवरे की|

किसी भटके हुए मुसाफिर सा हुआ हूँ,
पूछ रहा हूँ अजनबियों से मंज़िल अपनी|

ना पूछ कहाँ से लाता हूँ दर्द सारे,
हमको नवाज़ा है खुदा ने जागीर से|

तू रहे यूँ नज़र में बसा हमेशा,
बस आँखें मूंदू और दीदार हो|

याद को अदब नहीं है ‘वीर’,
आ जाती है ज़हन में बिना खटखटाए |

भागते-भागते बहूत थक तो गया है,
लेकिन फ़ासले नहीं बना पाया मुझसे वो |

देख तो साये का हुनर ‘वीर’,
सब का रंग एक है उसकी नज़र में|

रंग बिखर गए हैं एक तस्वीर के,
जाने क्यों अपना चेहरा धुंधला हुआ|

वजूद है सवाल सा खड़ा हुआ,
मायने ढूँढ रहा है ज़हन मेरा|

बेखबर हूँ अपने ही हाल का,
कोई तो सिरा मिले इस मलाल का|

नाम ना दे रिश्तों की खलिश को,
पुकार ले सभी को अपने नाम से|

कौन सा ज़ख्म हुआ फिर ताजा ‘वीर’,
क्यों है तू फिर मुरझाया हुआ|

मैं हूँ की मानता नहीं लकीरों को,
वो है की मुझे ढूंढती है वहाँ|

हर जगह से देखा है साहिल को,
क्यों है समंदर उससे लिपटा हुआ|

रहनुमा भी भटक गया है ‘वीर’,
देख आता है तेरी तरफ सवाल लिए|

हिदायतें कबूल हैं,
शिकायतें कबूल हैं|
तेरी सब अदायें हमनफस,
हम को कबूल हैं|

नूर-ए-खुदा फैला है लफ़्ज़ों में ‘वीर’,
देख हर हर्फ में है सनम तेरा|

दरारों से कुछ बह ना निकले ‘वीर’,
भर दे इन्हें अपने हाथों से|

किस-किस को ना बुलाया हमने शाम ढले,
चलो देख लेते हैं रात का चाँद साथ में|

नीला आसमान कब-तलक बादल से लिपटेगा,
काला हो जाएगा उसका ज़हन भी कभी|

काफी है तुझे इशारा ‘वीर’,
सरफरोशी तेरा मिजाज़ है|

कोई तुम्हें क्या समझाए बेखुद,
अपना खून क्यों जलाए बेखुद|

जल्द ही क़यामत हो तो हिसाब माँगू उससे,
इस नाराज़गी का जवाब माँगू उससे|
ये भी क्या बात हुई ‘वीर’,
रुलाए भी वो, हिजाब भी माँगू उससे|

मुझे पीने का शौक़ था,
खुल के जीने का शौक़ था|

भूलभुलैया हुई है जिंदगी ‘वीर’,
एक मकाम पर कितनी बार पहुंचू|

उस गली से घर तो दिखता था,
काफी बड़ा है शहर ये|

बेवफा लिख दिया हाथों में उसने,
लकीरें थी या मैं मुलज़िम उसका|

दायरे वफ़ा के,
जंजीरें खून की|
देख कोई बावला,
ढूंढता है जिंदगी सुकून की|

जिंदगी तुझसे वादा तो नहीं है ,
निभाऊंगा जब तलक मुमकिन हुआ|

झुठला कैसे दूँ अपने वजूद के सच को,
भुला कैसे दूँ आप के सितम|

भाग रहा था जिस कबूल-ऐ-वफ़ा से,
खड़ा मिला मुझे मंज़िल पर वो|

शोलों को बुझाना आसान ना होगा,
लग जाएगी सारे अश्कों की जागीर|

कुछ टूटा है मुद्दत का बंधा,
कितना बरसूंगा खबर नहीं..

सब कुछ जला ना दूँ कहीं मैं,
दहक रहा हूँ एक सवाल से|

क्यों हाथ लगाया तुमने ज़ख्म को ‘वीर’,
देख क़यामत सी बरपाई है दुनिया पर|

बहूत खोखला है रिश्तों का पिंजरा वीर,
भर ले इसे अपनी बेखुदी से तू|

कुछ अकेला था सहरा का आलम,
मुझसे मिलने के बाद|
क्या उसने भी देख ली हक़ीक़त आज…

तेज़ हवाओं सा उठा है सो कर ‘वीर’ ,
डूबेंगे कुछ साहिल वफ़ा के|

मैने दीवार फिर बना ली है,
कोई नहीं है काबिल-ए-वीर यहाँ|

अब संभालों तुम अपने काग़ज़ के आशियाँ,
मैं फूँक रहा हूँ बड़ी तबीयत से|

बदलते तेवर संभल जाने दे,
हौसलों का रंग बदल जाने दे|

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