बज़्म ए ख्याल – 17

महंगी नहीं है ख्वाबों की ताबीर,
बस एक जिंदगी की कमी है|

पल पल का हिसाब जोड़ा,
तो भी ज़िन्दगी ना मिली|
जाने क्या अदा है इसकी तुममें घुल जाने की|

उनसे क़ैद-ऐ-मोहब्बत ना देखी गयी..
तो ज़माने ने इसे सूली पर लटका दिया|

अब महफ़िलों से लो उठ चले हम,
सुना है कोई नया दर्द घर आया है|

लपेट कर सोया तो हूँ यादों को,
पर इन्हे बहूत कुछ सीखना है तुमसे अभी|

बंद ताले सा हर शख्स अपनी कड़ी से लटका है,
ना अंदर जाता है ना बाहर ही आता है|

अब लिखना मुश्किल हो रहा है,
किस सिरे से इसे पकडूं, किस गठान से इसे उठाऊं|

तुम सच हो ये मेरा गुमान ही सही,
मैं झूट हूँ ये तेरा ईमान ही सही|

मैं फिर अपने लफ़्ज़ों का हिसाब लगाता हूँ,
चन्द ही हैं ख्यालों की भीड़ में|

अब अंधरों से झूझता हूँ तो,
सवेरे नाराज़ हो जाते हैं|
क्या कीमत दूँ तुझे ऐ नींद बता..

गम की भी तासीर तेरे जैसी है,
जवान हो रहे हैं उम्र के साथ|

अंधेरे रास्तों को तुम्हारा नूर बरदाश्त नहीं,
मुझसे बदला लेते हैं तेरे जाने के बाद..

अब जिंदगी को कसूरवार ना कहिये,
उसकी कोई मजबूरी रही होगी…

तुम बदले, मैं भी बदला ‘वीर’,
कैसा हादसा दोनों के साथ हुआ|

खो जाऊं अपनी लकीरों से,
ख़त्म हो उनकी बंदगी अब|
जी लूँ अपनी ज़िद का होकर,
मेरी हो मेरी जिंदगी अब|

आज अभी, बस अभी, में कैसे जीते हैं ‘वीर’,
क्या बताएं बिना प्यास हम क्यों पीते हैं ‘वीर’|

उसी कोने से देखते हैं वही रहगुज़र ‘वीर’,
क्या बदला है तेरे सिवा आज यहाँ|

आँखों ने इजाज़त नहीं दी,
अश्क दरवाज़ा खटखटाते रहे|
कुछ अनकहा रह गया था,
नींदों में हम बडबडाते रहे|

वीर कज़ा, मोहब्बत और तड़प का होकर रह गया..
उसे सब काला ही क्यों दिखता है|

माज़ी के कुछ लम्हें ताज़े मालूम पड़ते हैं,
मेरी साँसों में अब तलक तेरी खूशबू जवान हैं|

वीर अकेला क्या लिखता रहता है तू..
उस काग़ज़ में क्या देखता रहता है तू?
क्या कुछ नज़र आता है तुझे,
क्या कुछ सोचता रहता है तू?

चल फिर मिलें उसी जगह,
देखेंगे उस भटकते बादल को,
वो भी आया होगा हम सा कोई फसाना लिए…

मुझे गम नहीं,
अफसोस भी नहीं|
मौत का क्या है,
उसे आना ही था|

इतने हम काग़ज़ों में मसरूफ हुए,
कुछ ही थे, वो भी हम से दूर हुए|
हम अपनी दुनिया ना बना पाए, ना सही,
पेड़ों की छाओं से भी दूर हुए|

इन खतों में हमारा अब भी कुछ ज़रूर है,
इन्हें साँस लेने दो|

बूँद-बूँद हम पिघलते हैं,
बादल हुई आज की रात देख|
साँस साँस हम सिसकते हैं,
काजल हुई आज की रात देख|

वो चटका हुआ आईना तुझसे नज़र ना मिला पाया,
देखा है उसने मुझे कई टुकड़ों में|

खाली घर नहीं है तेरे जाने के बाद,
उठा रहा हूँ लम्हें हर कोने से मैं|

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