बज़्म ए ख्याल – 18

कुछ कमी ज़रूरी है वफ़ा में,
दर्द से ही तो मुकम्मल होती है मोहब्बत|

तुम भी शीशे की असलियत जान ना पाए,
बेज़ुबान है पर बेनज़र नही है वो|

खुदी बिखर गयी है चारों तरफ,
अरसों में खिला है ज़हन मेरा|

हर लफ्ज़ की सदा हुई है सवाल सी,
चल के हो गयी है बज़्म बवाल सी|

शजर से टूटी शाख जड़ें ढूढ़ती हैं..

आ लफ्ज़ भी बाँट लेते हैं,
‘हम’ से ‘तुम’ और ‘मैं’ छांट लेते हैं|

यही दिन था उस साल का,
खूब माजरा था बवाल का|

मैं कोशिश करता हूँ भूल जाने को,
आप मगर नहीं भूलते याद दिलाने को|

रुसवा हुए अश्क गिर कर ज़मीन पर,
आरज़ू थी इन्हें भी तेरे दामन की|

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