बज़्म ए ख्याल – 2

सोय हुए अरमान फिर जागेंगे ज़रूर,
तुमसे बेवफ़ाई का सबब मांगेंगे ज़रूर|

रखकर निगाह में तस्वीर ख्वाब की,
एक रात गुज़ार दी हमने बेताब सी|

चेहरे बदल-बदल के मिलते हैं मुझसे दर्द ‘वीर’,
एक ही जज़्बात ने नक़ाब पहने है कई रंग के|

माना के मुश्किल बहूत है ये इम्तहान,
हम भी रखते हैं दोस्त मगर सख़्त जान|

जैसे मेरे पैरों के निशां पर चलकर,
कोई मुझ तक पहुँच गया हो|

मैं जैसा भी हूँ मंज़ूर कर मुझे,
अपने आप से ही ना मजबूर कर मुझे|

मुझे मोहब्बत है इसलिए ही दूर रहता हूँ तुझसे,
मेरे साये से तेरा चेहरा, अक्सर मुरझा जाता है|

पत्थर की लकीर सा था तो मैं मिटा ना पाया उसे,
मेरे अंदर वो शख्स बोलता रहा सारे कड़वे सच|

दिन फिर भी गुज़ार लेते हैं दुनिया के बवाल में,
रात मगर कटती नहीं इंतज़ार ए विसाल में|

यादों की ओस से दिल की तिश्नगी ना बुझे,
हसीन इत्तेफ़ाक़ सा एक बार फिर मिलजा मुझे|

काग़ज़ पर लफ़्ज़ों की बेडियां पहने चंद जज़्बात,
कर रहे थे गीला दिल से बेवफ़ाई का|

तजुरबों के निचोड़ से धोकर मैली चादर हक़ीक़त की,
हमने डाल दी हसरातों की छत पर सूखने के लिए|

कुछ लम्हें मुझसे मिलने आए थे,
यादों की सौगात लेकर…
मायूस ही चले गये सारे,
दरवाज़े पर एक बड़ा ताला देखकर|

भागता दौड़ता रहा मैं किनारों से उलझता हुआ,
दर्द आँखों में नमी सा ठहर गया, सुलगता हुआ|

शाम के दामन में चाँद तारे करवट लेते रहे..
मगर रात घूँघट में ही रही,
तेरे बिन रात को मुँह-दिखाई ना मिली|

ये ग़लत है के आदमी मजबूर होता है,
हर एक क्यों का जवाब ज़रूर होता है|

ख्यालों के बवंडर से निकल और सोच की तलवार उठा,
सवालों के चक्रव्यूह पर जवाबों के तीर चला|

0.00 avg. rating (0% score) - 0 votes
%d bloggers like this: