बज़्म ए ख्याल – 3

आज तनहाई को कोई रंग नही दूंगा,
देखूँ कितना फीका है ज़हन उसका|

क्यों हाथ लगाया तूने ज़ख्म को ‘वीर’,
देख क़यामत सी बरसी है दुनिया पर|

जिंदिगी तुझसे वादा तो नहीं है ,
निभाऊंगा जब-तलक़ मुमकिन हुआ|

ये भी मुमकिन है की लौट ना सकूं कभी,
ये भी जायज़ है की तुम इंतज़ार ना कारो|

मैं हूँ की मानता नहीं लकीरों को,
वो है की मुझे ढूंढती है वहाँ|

हिदायतें कबूल हैं, शिकायतें कबूल हैं|
तेरी सब अदायें हमनफस, हमको कबूल हैं|

मैं बस शहद नहीं हूँ यार मेरे ,
कुछ नीम के पत्ते भी हैं मुझसे लिपटे हुए|

मोहब्बत में बंदगी कर बैठा ‘वीर’,
संगीन जुर्म है क़ाबिल-ऐ-सज़ा हैं हम|

लफ़्ज़ों के नक़ाब से गम छुपा लिया करते हैं,
तारीफ-ए-गज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं|

हमें उम्मीद ना थी के सदा यूँ भी रंग लाएगी,
एक दरार से निकला है पूरा समुंदर यहाँ|

हर किसी का दावा है मेरे बुझते चिराग पर,
जाने क्यों मोहलत चाहिए हर शख्स को यहाँ|

इतनी मासूमियत से उसने हाल हमारा पूछा ‘वीर’,
हमसे कही ना गयी कोई बात कड़वी उससे|

बेकरारी जवान हुई तो हम सुकून से बैठ ना सके,
ढूँढते रहे तेरे अक्स को हर तस्वीर में हम|

तेरी ही नज़र को क्यों तरसूं बता ‘वीर’,
देख रहा है मेरा तमाशा सारा जहाँ|

अपनी तकलीफ़ को यूँ ना ज़ाया कर दूसरों पर ‘वीर’,
ज़हन के कोने से एक गज़ल झाँकती है तुझे|

जो थाम ना सके तुम मुझे गिरते हुए,
अब पूछो ना मुझसे उस हादसे के बारे में|

झटक कर ज़हन मैने तेरे सारे ख्याल उड़ा दिए,
तो सताने लगे मुझे सवाल अपनी पहचान के|

आज एहसास हुआ मुझे तेरे चले जाने का,
संभाल के रखा था जो अश्क, आख़िर बह ही गया|

मुझपर शर्मिंदा आँखें तेरी,
तोहमत सी लगी मुझे साँसें मेरी|

नये ख्वाबों नये इरादों की ज़रूरत है,
अब मुझे कहाँ जवाबों की ज़रूरत है|

दिल के अंधेरो को मेरी आग ने रौशन क्या किया,
बदल गया है हर एक लम्हा हौसले की चिंगारी में|

ये तेरा सबसे दूर जाने का कौन सा तरीका है ‘वीर’,
खफा खुदसे है तू और तुझे मना हम रहे हैं|

थोड़े अदब से क्या क़ुरबतें मिट जाएगी,
खुदा ना समझो मगर इंसान तो रहने दो|

मैं खामोश रहूँ तो शायर मर जाएगा,
कुछ कह दूं तो आशिक़ की जान जाएगी|

मैं गर कलम कर दूँ अपने दिल का सारा मंज़र,
रूठ जाएगा खुदा भी अपनी दुनिया देखकर|

सिसकियों से भरी इतनी जिंदिगियाँ क्यों हों,
दूर लोगों से इतनी खुशियाँ क्यों हों?

इस महफ़िल से उठ चले जो हम बदनाम होकर,
लोगों को मिल गयी एक वजह रुक्सत होने की|

मैं ज़ाया क्यों करूँ वक़्त तुम्हारा,
मेरे पास और कुछ नहीं है देने को|

हम दिल रखते हैं बड़ा नाज़ुक सा ‘वीर’,
हमसे बोला करो बात कड़वी भी मोहब्बत से|

कलम है की कोई खंजर तेरे पास ‘वीर’,
कुरेद देते हो मेरे ज़ख्म भरे हुए|

मुझ से गज़ल का तार्रुफ़ कराने वाले,
क्या कुछ मिला है तुमसे, हमको छोड़ के जाने वाले|

बेखयाली रही, बेकरारी रही,
आँखों में रात सारी रही|

तेरे लफ्ज़, दुआ बनकर साथ रहते हैं हर पल..
कभी चुन लेता हूँ हौसला, कभी छू जाती हैं हसरतें|

ऐसे मुसाफिर भी हैं जो मंज़िल नहीं कारवाँ ढूँढते हैं,
एक कदम रखते ही लौटने का रास्ता ढूँढते हैं|

नज़दीकियों का डर है और फासलों का ख़ौफ़ भी,
मुझे देखो ये ज़रूरी है, मगर बिना पैराहन के नहीं|

एक उम्र में ही गुज़ार रहे हैं जिंदिगियाँ इतनी,
हाथ की लकीरें कम हैं मुक़द्दर लिखने के लिए|

मुझ पर ऐतबार रख और मेरे ईमान पर भरोसा,
मैं गिरने नहीं दूँगा खुदको अपनी नज़र से|

बस कह देना, जब मेरे होने से ही तकलीफ हो तुम्हें,
मुझे खाक होने के लिए मोहलत नहीं चाहिए|

मेरी कलम से निकली जब आखरी आह ‘वीर’,
कई लफ़्ज़ों ने मुझे बेवफा कहकर ज़लील किया|

मेरे ईमान को रुई के ढेर से ज़्यादा कुछ ना समझा,
हवा चली तो उसने मुझे लकीरों से मिटा दिया|

खुदको गिरवी रख कर हमने मोहब्बत ख़रीदनी चाही थी,
कुछ ज़्यादा ही थी मगर खुशियों की कीमत|

ना कोई शख्स है ना किसी शख्स की तलाश,
इस मोहब्बत को हमने तन्हाइयों में छोड़ दिया|

मुझसे बाँट ले अपने अंधरों की मुसीबतें,
मुझे सहर का ना कोई दावा है ना इंतज़ार|

इस दिल के वीरानो को फिर रौशन कर दे,
मेरी खलिश को अपनी तन्हाइयों से भर दे|

खुद में एक समंदर है देखिए तो ज़रा,
क्या कुछ अपने अंदर है सोचिए तो ज़रा|

मैं हैरान हूँ इस दिल की क़ाबलियत पर ‘वीर’,
जो मिला है टुकड़ों में उसे बाँट रहा है सारी क़यानत को|

क्यों ना नाज़ हो हमें अपने दिल पर वीर,
हर ज़ख्म की दरारों में इसने मोहब्बत भर ली है|

मेरी ख़ैरियत की दुआ ना कीजिये अपनी इबादत में,
मैं तलबगार हूँ लहरों का, मुझे साहिल गवारा नहीं|

अपनी दीवारों में क़ैद है हर शख्स यहाँ,
सबको ही ख़ौफ़ है हाकिम का इस क़दर|

जब क़ुबूल है मुझे अपनी बिखरी शक्सियत ‘वीर’,
क्यों गीला रहे किसी को हमारी फ़ितरत से|

बिल्कुल लाज़मी है तेरा उकता जाना इस ज़िन्दगी से,
कोई एक ही मंज़र को कब तलक़ आँखों से लगाये रखे|

मैं देख रहा हूँ इतने टूटे हुए इंसानो को,
मुझे शक़ है के तूने गिरा दिया है क़द अपने हुनर का|

मेरी मंज़िल एक थी मगर उसके ठिकाने कई,
मुझे ना मिलने के उसने ढूँढ लिए बहाने कई|

यूँ ना समझ के मैं अंधरों में साथ नहीं था,
तुम बस मुझे देख ना पाए चिराग बुझने के बाद|

आ मिल गले मुझसे के अब, बहूत परदा हो गया है,
तेरे रुख़ पर तबस्सुम देखे, बहूत अरसा हो गया है|

जो मुमकिन हुआ वो मैने किया तो ज़रूर,
कमी फिर भी रह गयी वफ़ा में मेरी वीर|

इससे तो कोई परदादारी नहीं के तुम मेरे साथ हो,
मगर ये भी सच है के मैं कई टुकड़ों में बाटा हूँ|

मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे वीर,
ये मेरी इल्तज़ा है और मेरा हक़ भी|

अब ना गीला है ना शिकायत कोई तुमसे ‘वीर’,
तुम भी ढूँढ लो मेरी तरह मंज़िल नयी|

ये अंधरों की मेरे खिलाफ कोई साज़िश है ‘वीर’,
आए हैं मुझको डूबोंने आखरी शमा बुझ जाने पर|

खामोश हो गया जब मैं शोर थम जाने पर,
शर्म सी आई मुझे खुदको अपना गम बताने पर|

हर फसाने को एक मकाम तक पहुँचने की जल्दी है,
महसूस होता है जैसे वक़्त के पास अब मोहलत कम है|

मुझसे ईमानदारी चाहते हो अगर,
तो सच सुनने का जिगर भी रखो|
मुझमें काफ़ी बुराइयां है,
मगर तुम खूबियों पर नज़र भी रखो|

ये ज़िन्दगी भर के वादे बेवफा करते होंगे ‘वीर’,
मैं दूं कैसे तुम्हें वो, जिसपर मेरा इख्तियार नहीं|

अब हमें सताती नहीं बेरूख़ी उसकी ‘वीर’,
अब हम आईने भी कम ही देखते हैं|

नज़र मिलाई तो झूठ तुम्हारा पकड़ा जाएगा वीर,
आँख चुराकर बस कह दिया कारो – सब ख़ैरियत है|

उलझन के दायरों के आगे,
समझ की बंदिशों से परे|
ज़िन्दगी कुछ और भी है..

कामयाब ज़िन्दगी की अपनी मुसीबतें हैं,
करेंगे बात हम, तुम आओ तो इस मोड़ तक|

वो और हैं जो चंद चिरगों के कायल हैं,
हमसे नज़र अंदाज़ नहीं होते ये अंधेरे ‘वीर’|

तेरी कलम की स्याही बहूत काली है ‘वीर’,
ऐतराज़ क्यों ना हो सफ़ा को तेरे सुखन से|

खामोश ज़हन में आवाज़ें चीखती रहीं,
एक रात को सहर का इंतज़ार रहा देर तलक़|

बेटे को उसके दर पर, रहम की भीख मांगती माँ गवारा हो गई,
इस दौर में वीर माँ की कीमत भी नकारा हो गयी|

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