बज़्म ए ख्याल – 4

वो ज़माना ही कुछ और था दिल मेरे,
हमें मोहब्बत के सिवा और कोई काम न था|

शब-ए-फिराक़ का ये आलम क्या बयाँ करूँ,
उसके ख्यालों ने फुरसत नहीं दी इंतज़ार की|

मेरे बाद गर मुझे ढूंढता वो आये इस दर तक कभी,
कह देना इसी चौखट पर गुज़ारा करता था, वो हर शाम अपनी|

एक जिंदगी चंद लम्हों में जीने की कोशिश,
और एक जिंदगी जहाँ चंद लम्हें ही याद रहें|

मुझ पर दावा-ए-हक़ के तलबगार ना बनो,
ये शौक़ है ज़माने का, तुम पर जचता नहीं|

एक ज़िन्दगी भी शायद कम है इस विसाल के लिए,
क्यों हो मायूस हम चंद हसरतों के मिट जाने पर|

बस तुम्हारी आवाज़ में सुनकर अच्छा लगता है,
वरना ऐसा कुछ नहीं जो मुझे मालूम ना हो|

हर्फ़ से ज्यादा, मुझे तुम्हारा अंदाज़ा है ‘वीर’,
मैं वो भी जानता हूँ जो तुम लिख ना पाए|

मुझे ना दो यूँ इशारों में इल्ज़ाम ‘वीर’,
मैं कड़वे सच का आदि हूँ, मुझे अदाकारी पसंद नहीं|

वक़्त का क्या है, वो फिर बदल देगा वीसात अपनी,
तुम चाह सको तो चाहो मेरी रूह को|

मैं पूरी ही उम्र लफ़्ज़ों में गुज़ार देता ‘वीर’,
ना होता गर मुझे वास्ता उन चंद लोगों से|

मुझे बेवफा न समझ हमनफस मेरे,
मुझे रास्तों का शौक़ है, मुझे मंज़िलें कब रास आई हैं|

अदा कर कहीं चले जाए क़र्ज़ उसका ‘वीर’,
अब संभलता नहीं इन कंधों पर बोझ इतना|

अब मुस्कुरा भी दे हालत-ए-ज़िन्दगी पर ‘वीर’,
देख कैसे हंस रही है हर मुश्किल तुझ पर|

उन्ही ज़ख़्मों को फिर से कुरेद लेते हैं ‘वीर’,
जिन्हें बड़ी मुश्किल से चरागर मिला था|

लुत्फ़ अपना है हर दर्द को हदों तक महसूस करने का,
ये इनायत हर किसी को बख्शी नहीं है खुदा ने|

किसी तीसरे की उम्मीद भी ना किया कर दिल मेरे,
सिर्फ़ तुम और मैं ही हैं इस दश्त-ए-तन्हाई में|

अब तो तलाश कर के देख भी लिया जहाँ तुमने,
बोलो मिला क्या कोई तुम्हें दर्द समझने वाला?

तुमने लाख चाहा मुझसे परदा कर लो ‘वीर’,
मैं अक्स हूँ, मुझे आईनों का डर नहीं|

मुझे अधूरा सा छोड़ कर कहाँ जाओगे तुम,
मैं तुम्हारा फसाना हूँ,
कभी तो मुझसे नज़र मिलाओगे तुम|

वक़्त की वीसात पर किसी मोहरे जैसी ज़िन्दगी है,
वो खेल रहा है हम पर कोई चाल हर दिन|

डूब जाए खुद में समंदर, क्या मुमकिन है?
टूटता जाए वो साहिल अंदर अंदर, क्या मुमकिन है ?

वो बचपन का आखरी दिन याद है मुझे अब तलक़,
किसी ने तोड़ दिया था मुझे कच्चे घड़े की तरह|

निभा जाए ज़िन्दगी ऐसा कोई वादा बता मुझे ‘वीर’,
इनका टूटना ज़रूरी है, इंसान का इंसान होने के लिए|

मैने तो सोच समझकर के ही दिया था उसे अपना हाथ,
मुझे खबर ना थी के वो लकीरों के खेल में कच्चा है|

एक क़ाबिल सी दुनिया ढूँढने की कोशिश कब तलक़ ‘वीर’,
अपने ज़हन के सिवा कुछ भी नहीं तेरे इख्तियार में|

फिर से जलाओ अपने अंदर वही आग ‘वीर’,
पिघल जाए पत्थर भी तुझे छू कर|

ख्वाब अच्छे चुन कर मैने तुम्हारे तकिये के नीचे रख दिए हैं..
तुम इन्हें पिरोकार अपनी रात सजा लेना|

ऐसा तो नहीं की सिर्फ़ मोहब्बत ही ज़िन्दगी है ‘वीर’,
मगर कोई बताए हमें के, और क्या क़ाबिल-ए-हासिल है यहाँ|

तुमसे नाता तो बहूत पुराना है मगर ‘वीर’,
कुछ याद तुम्हें नहीं, कुछ हम भूल बैठे हैं|

चलो मान भी लेते हैं, की हम ही जिम्मेदार हैं,
हमसे मगर उम्मीद का दामन ना छूटेगा साँस रहते|

कोई ईमान बताए मुझे, तो कोई नसीहत दे प्यार की,
मैं सीधी बात करके यूँ उलझा हूँ दानाईयों में|

सच को तो आदत है पर्दों में रहने की ‘वीर’,
और झूठ है के सज संवर के रोज़ निकलता है|

अब के जो छूटा हाथ से तो बिखर ही जाएगा,
वो अंजुमन जो मैंने बड़ी शिद्दत से बनाया है|

मुझे अंदाज़ा है के ज़िन्दगी और क्या कुछ होती ‘वीर’,
और ये इल्म भी है के करनी पड़ेगी बसर यूँ ही|

मैं तो अंजान ही था उसके रसूख से ‘वीर’,
उस में काबिलियत है और हुनर भी ग़ज़ब का|

गहराई में डूब कर ही निकलेंगे मोती ज़हन से,
मैं इंतज़ार में हूँ, तुम्हारा नया चेहरा देखने को|

सच तो ये है के मुझ में कभी कुछ था ही नहीं,
तुमने ही इबादत की और तुमने ही मुझे खुदा बनाया|

मत सोच के दुनिया से तेरे वास्ते का क्या होगा,
इसमें गर नहीं है कुछ तेरे लिए, ना सही|

ये ज़िन्दगी का सफ़र, ये मंज़िल मोहब्बत की,
सब सिर्फ़ रास्ते हैं खुद तक पहुँचने के|

खुदको गर पा जाए तू मेरी कीमत पर,
मुझे हर्ज़ नहीं दोस्त, सौदा सस्ता है|

मुझे दुनिया के रिवाज़ मत बता ‘वीर’,
वो शख्स अपने में समेटे हुए है वजूद मेरा|

अकेलापन कोई सज़ा तो नहीं ‘वीर’,
लोग क्यों डरते हैं अपने ही अक्स से?

एक मकाम खामोशी का भी आता है मोहब्बत में,
लफ्ज़ कम पड जाते हैं बयान-ए-मंज़र के लिए|

इतनी मोहब्बत का इज़हार कैसे करूँ बता ‘वीर’,
एक पल को भी ख्याल, दामन उसका छोड़ता नहीं|

बेफ़िज़ूल की बात करना तुम्हारे बस का नहीं ‘वीर’,
लफ्ज़ भी खर्च करते हो तो मुफ़लिसी के सताये हुओं से|

दूर काफ़ी निकल आया हूँ तेरे साथ मगर ‘वीर’,
ये ज़रूरी नहीं हमारी मंज़िल एक ही हो|

हक़ भी एक अजीब सी शय है ‘वीर’,
उसको हासिल है बिना किसी इजाज़त के|

मुझे एक सवाल घेरे है शाम से,
तुझसे छीन लूं खुदको तो क्या बेवफ़ाई होगी?

मोहब्बत में कब चाहा है मैने, फरिश्ता बन जाऊं,
तू मुझे गर इंसान ही रहने दे तो करम होगा|

सब ही तो जीते हैं खोकले मरासिम लेकर ‘वीर’,
हमनफस हमसफ़र हो ये ज़िद क्यों?

एक दुनिया मोहब्बत की बनाने निकला था मैं,
मुझे क्या खबर थी इस काफिले में लोग चंद ही मिलेंगे|

मुझको गम नहीं के अपने भूल चुके हैं मुझे,
मुझ में ही नहीं है कुछ याद रखने सा|

मैने आईना नहीं देखा है बरसों से ‘वीर’,
उसकी आँखों में अक्स देखकर रोज़ सोता हूँ मैं|

मुमकिन नहीं उस से मुँह फेरना मेरा,
चाहे मोहब्बत कहो या कमज़ोरी मेरी|

वो और हैं जो तेरी महफ़िल से उठ गए ‘वीर’,
हमें अभी देखना है तुझे शर्मिंदा होते हुए|

बेसबब नहीं है इस सच से मेरी बेरूख़ी ‘वीर’,
इससे रूबरू होने का हौसला अभी मुझमें नहीं|

शमा की मोहब्बत भी क्या मोहब्बत है ‘वीर’,
अपने परवाने को खाक में मिलाती है,
मोम के आँसू बहा कर|

काश के होता मुझे कबूल तेरा बदला हुआ ये अंदाज ‘वीर’,
मैं अब भी ढूंढता हूँ तुझमें,
वो शख्स जो मेरा हुआ करता था|

प्यार जताना और बात है,
इसमें जलकर खाक हो जाना एक और|
किसी से दिल लगाना और बात है,
किसी पर ज़िन्दगी लूटा देना एक और|

अब कोई ना आ सके इस वीराने में ‘वीर’,
ये तेरा आशियाँ है, इसको कोई और गवारा नहीं|

लफ़्ज़ों को हमसफ़र बना कर जीस्त गुज़ार लेंगे,
जब खामोशी सतायेगी हमें, तेरा नाम पुकार लेंगे..

लफ़्ज़ों से जुड़े हैं कई मरासिम अंजाने से ‘वीर’,
वो बहते हैं तो निकल जाता है गुबार दिल से|

यूँ तो मेरी नींद से दुश्मनी नहीं कोई ‘वीर’,
गीला ख्वाइशों से है जो रात भर सताती है मुझे|

एक उम्र लगी तुम्हें इतना समझने में ‘वीर’,
किसी की खुशी तुम्हारे इख्तियार में नहीं|

समझे तो हैं ‘वीर’ इस दिल के खेल को हम,
आदत चाहे बुरी सही हमसे छोड़ी ना जाएगी|

हर आँख में वही सवाल मिला मुझे ‘वीर’,
क्या है बता तेरे दामन में मेरे लिए|

कुछ ना कहे तू तो भी मुश्किल है ‘वीर’,
कुछ कहे अगर तो गुस्ताखी होती है|

गुमान है मुझे के, भागकर साये से बहूत दूर निकल आया हूँ,
हक़ीक़त है के, भागते भागते मैने रात की तारीख में खुदको खो दिया है|

ना-मुमकिन से मेरा तारुफ बड़ी देर से हुआ ‘वीर’,
मुमकिन न हुआ जब हाथों की लकीरें बदलना|

मुझे हैरत क्यों न हो इस अदा पर ‘वीर’,
मेरा गम एक खता है उसकी नज़र में|

चलिये नाम बदल लें एक रोज़ के लिए हम,
बहूत दिन हुए मुझे किसी ने पुकारा नहीं|

दिलकश है और दिलफरेब भी, इश्क की बनावट ‘वीर’,
देखिए मुस्कुराते हैं वो, मुझ पर सितम ढाने के बाद|

रुक रुक कर हमें बुलाते हैं वो मंज़र हसीं,
रुक रुक कर हमें वो याद आता है अक्सर|

चाहे कहो इसे इत्तेफाक, चाहे लकीरों की साज़िश,
जो मिला है मुझे जिंदगी से, वो इतना मामूली नहीं|

तुझे वास्ता है मेरी इस हालत का ‘वीर’,
दिल हूँ तेरा, मुझे कुछ तवज्जुब दिया कर|

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