बज़्म ए ख्याल – 5

उनको मामला समझाने का क्या फ़ायदा ‘वीर’,
उनका ज़िन्दगी जीने का है अपना क़ायदा ‘वीर’|

एक तरफ हवाओं का रुख़ है,
एक तरफ लहरों का जुनून|
कशमकश में हूँ,
डूब जाऊं या बह चलूं|

ये सच है ‘वीर’ इसको निगल जाओ तुम,
घर के लोगों ने ही घर में आग लगाई थी|
ख़ैरियत भी ना पूछी आपने हमारी,
और हमने क्या कुछ की ना आस लगाई थी|

कच्चे धागों के मरासिम भी झेल जाते है हवाओं को,
खून है तो आख़िर तूफानों से मुँह क्यों मोडता है|

मुझे ये मलाल रहा बरसों तलक़ वीर,
गर खून है उनका तो मुझ में दौड़ता क्यों नहीं|

मुझमें दर्द का बीज बोने की तुम्हारी कोशिश नाकामयाब रही,
तुम भूल गये की ‘वीर’ की ज़मीन में सिर्फ़ जज़्बात उगा करते हैं|

साँस थम गयी थी ज़माने की चलती हुई,
कुछ देर रुक गयी थी शाम ढलती हुई|

थम सा गया था लम्हा बहते-बहते,
रुक से गये थे हम कुछ कहते-कहते|

वो गहरी सासें दफन हो जाती मेरे बिना ‘वीर’,
उन बादलों का बहाना मिल गया मेरी बूँदों को|

नींद का चटकना ज़रूरी है,
फिर ख्वाब देखने के लिए|

हर एक लम्हें की कली खिल गयी है तेरे होने से,
गुलज़ार हो चली है मेरे ख्वाबों की ज़मीन सारी|

मुफ़लिसी में वो दीवाली का दिन अब भी याद है ‘वीर’,
मुट्ठी भर फटाकों का, दो भाईयों ने बटवारा किया था|

ना होली में रंग लगा, ना दीवाली में गले मिले,
ये शहर देखने में बड़ा है, दिल का नहीं|

ग़ैरत ने कई बार मासूम को ललकारा था,
मगर इस दिल ने फिर भी उसका नाम पुकारा था|

गर देखो बारीकी से, तो नज़र से बच ना पाएगा,
तराज़ू में तोलने से, तू सच ना पाएगा|

मैने तामीर किया है अपने इरादों से नया रास्ता,
मुझे ख़ौफ़ नहीं है मुश्किलों की साज़िश का|

शीशा हूँ मुझे बदलना ना-मुमकिन है ‘वीर’,
आईनों से कहो मुझे देखना हो तो अपना अक्स देखें|

मुझे आती नहीं सरहदें बनाने की अदा,
चला जाता हूँ बेखुदी के वीरानों में तन्हाइयां लेकर|

खुद से निकला आदम तो दुनिया मोहब्बत की उसे मिली,
पूछिए उससे, के जाता कहाँ जो यार ने दिल से निकाला होता|

हाथ लगा कर देख लूँ,
साँस बना कर देख लूँ|
एक ख्वाब देखा कई बार,
अब खुदको जगा कर देख लूँ|

अपनी ज़िन्दगी, अपने खुद का एहसास नहीं रहा,
ले गयी बहुत कुछ मुझसे, तमन्ना तेरे पास होने की|

जुनून की दीवारें गिरी तो नज़र आया,
एक खूबसूरत सी दुनिया है मेरे आँगन में|

कभी आएगी मोहब्बत गर इस दर को ढूँढते हुए,
कह दूँगा तुमसे आशना तो है मगर कोई मरासिम नहीं|

खुद को बीन कर जा रहा हूँ घर को मैं,
इन रास्तों पर मुझे सिर्फ़ मैं ही नज़र आता हूँ|

मेरी कलम के जाल में मेरा हर ख्याल उलझ गया,
मामला संगीन तो था, मगर खुद बा खुद सुलझ गया|

मुझसे ना मिलती तो जाती कहाँ रूठ कर,
सिर्फ़ मैं ही तो था तलबगार उस मंज़िल का|

मेरे काले हाथों में, लकीरें भी हैं और स्याही भी,
मैं हूँ एक शराबी सा और उसने थोड़ी है पिलाई भी|

मेरे सही ग़लत का तराज़ू दिल से लटका है ‘वीर’,
सबब ना पूछो के हम को क्यों कोई पसंद नहीं|

मैं दीवाना हुआ तो सबको याद आ गयी रंजिशें,
हर संग जो था सर के निशाने पर सीधा दिल को लगा|

बेइंतहा मोहब्बत की आरज़ू तो हर दिल में है,
मगर उसने दी नहीं है ज़िन्दगी सबको फ़ना होने के लिए|

हमको हमारी दीवानगी का मर्ज़ पता है,
खड़ा है सामने घूरता फ़र्ज़ पता है|

खरे सच में थोड़ी सी ग़लतफहमी मिलाके, ज़हर बनाया है,
हमने इमारत के टुकड़े करके, एक पूरा शहर बनाया है|

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