बज़्म ए ख्याल – 6

अभी एक उम्र बाकी है तुझे प्यार करने को,
अभी तो मैंने सिर्फ खुद को गवाया है|

कुछ नए ख्वाब देखने का मौसम आया है,
हमने फिर उन्हीं उम्मीदों से घर सजाया है|

मुंतजिर के अब शाम खिलने को है,
एक शायर से उसकी नज़्म मिलने को है|

मैने तो वक़्त को थाम दिया है तेरी नज़र,
लोग नाहक ही खुदा खुदा करते हैं|

आ सीखा दे मुझे भी बेवफाई ज़िन्दगी,
क्यों इल्ज़ाम रहे सिर्फ़ तेरे हिस्से में|

मैं और कुछ नहीं बस तेरा ही एक हिस्सा हूँ,
पहचान मेरी है या शक्सियत तेरी|

बस लिख कर भूल जाता है ‘वीर’,
लफ़्ज़ों से कच्चा ही है मरासिम उसका|

मैं सादगी से कोसों दूर हूँ ‘वीर’,
उलझा हुआ है मेरा हर ख्याल उस से|

कई और आए हैं ख्वाब ज़हन में,
कुछ और ही है मुझे गीला हक़ीक़त से|

मैने बदले हैं कई रंग दिन के उजालों के,
मुझ में हुनर है शम्मा बुझाने का|

वक़्त बदलता है, उसकी अदा है ‘वीर’,
जहाँ रुख़ हो लहरों का ज़िन्दगी को बहने दो|

महफ़िल मैं नज़र झुका के चलो ‘वीर’,
पहचान ना ले कोई लेनदार तुझे|

जाने क्यों बुझा-बुझा सा है महफ़िल का रंग,
क्या हमने देर कर दी या वो वादा भूल गए|

एक उम्र बीता दी हमने खुदको समझने में,
गर हादसा हुआ है तो इत्तेफ़ाक़ भी होगा|

ज़िद तुम्हारी मैने कब नकारी है,
तुम ज़ुल्म करो हम नाज़ उठा लेंगे|

तेरी उंगलियाँ मेरी उंगलियों से उलझती तो रही,
ये बात और की लकीरें धुंधली ना हुई|

तेरे दर तक आती हर गली हमने रेंग कर नापी है,
जाने क्यों हर बार दरवाज़ा बंद ही मिला|

काले सच को सफेद झूठों से पिरोया तो है ‘वीर’,
फिर क्यों आँखों के ये बादल पिघल जाते हैं|

देख कर घर की दरारों को ‘वीर’,
हम रास्ते भी तुझसे भटक गये|

सजदे तो किए मगर, इबादत भूल गये|
इतने दाना हो गये की शराफत भूल गये|

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