बज़्म ए ख्याल – 9

मायूस दिलों में उम्मीद जगाई जाए,
वीर चलो इस बार ऐसी ईद मनाई जाए|
मुफ़लिसी ने सितम ढाया है जिन पर,
उन चेहरों पर मुस्कुराहट सजाई जाए|

जुनून की इंतहा का इल्म है ‘वीर’ को,
उसने सिर्फ रास्ता बदला है, हौसला नहीं|

गीला ना रह जाए तुझे अपनी ज़िन्दगी से ‘वीर’,
एक कोशिश लाज़मी है खुद को ठुकराने से पहले|

रास्ते ख़त्म कहाँ होते हैं साहिलों पर पहुँच कर,
थोड़ा वक़्त ज़रूर लगता है एक कश्ती बनाने में|

मोहब्बत को शहादत नहीं इबादत बना,
दिल को अपनी कमजोरी नहीं ताकत बना|

एक उड़ता बादल मेरे नाम का,
तुम आसमान में टाँग कर देखो|
होता है ना-मुमकिन भी मुमकिन यहाँ,
तुम दिल की गहराई से मुझे माँग कर देखो|

कुछ बदला-बदला है आईने में ज़रूर ‘वीर’,
मुद्दत हुई खुद को इतने करीब से देखे हुए|

प्याज की परतों सा छुपाया है उसने हस्ती को,
नम हो जाता है हर ज़िक्र-ए-माज़ी से वो|

तुम्हारे क़ब्ज़े से में अपने दिन-रात उठा रहा हूँ,
अपनी बुझती हुई चिंगारी को फिर सुलगा रहा हूँ|

कदम उठा के मंज़िल आँख बिछाए बैठी है ‘वीर’,
अब बहुत हुआ तेरी आवारगी का बेसबब सिलसिला|

इतनी कहानियों में एक किरदार बनकर क्यों रहूं,
वक़्त आ गया है अपना एक फसाना लिखने का|

तुम्हारी ख्वाइशों को अपना ईमान बना कर जिया है,
अब शरमिंदा हूँ के ये मरासिम मोहताज है चन्द शर्तों का|

अब जब सिर्फ खामोशी ही बची है हमारे दरमियाँ,
क्यों करें हम इस को रुसवा यहाँ वहाँ की बातों से|

मेरे हाथों को आदत थी तेरे हाथों की,
मगर इन लकीरों से देखा ना गया साथ हमारा|

मैंने कहा था तुमसे एक ज़माने पहले,
देर-तलक़ ना रहेगा ये क़ुरबत का मौसम|

जो चाहे वो कीमत ले लो फिर मुस्कुराने की,
हाँ हमें आती नहीं अदा तुम्हें मनाने की|

मेरे सफेद दिल और काली शक्सियत का गवाह मत बन वीर,
मैंने हर रंग को चेहरे पर लगाया है तुम्हारे लिए|

मैंने ठुकराया है मंज़िलों की सदाओं को कई बार ‘वीर’,
मैं खुश हूँ तुम्हारे साथ अधूरे सफर में भी|

हमने ज़िन्दगी को कई हिस्सों में बाँट दिया है ‘वीर’,
जैसे कोई और जी रहा है इनमें मेरा नाम लेकर|

अपनी कलम को हमने सूली पर टाँग दिया ‘वीर’,
इन लफ़्ज़ों की सिसकियों से अब दर्द जाता नहीं|

लफ़्ज़ों और खामोशी का एक भवँर है ज़हन मेरा,
जो निगल रहा है मेरी हसरतों की हर कश्ती को|

ख्वाब मैं लफ़्ज़ों से सवार दूं,
ये ग़ज़ल तेरी सादगी पर वार दूं|
अगर इजाज़त हो तो,
तुझे अपना कहकर पुकार लूं|

समंदर कब बेचैन हुआ है गहराईयों से ‘वीर’,
ये तजुरबा नया है उसके लिए जो पहली बार डूब रहा है|

अब वहम धीरे-धीरे यकीन में बदल रहा है,
ठहरा हुआ है समंदर, ये दश्त ही चल रहा है|

खुद में खो जाना, इतना मुश्किल भी नहीं है,
मुझे भूल जाना, इतना मुश्किल भी नहीं है|

सारे सवाल फिजूल हैं, कब समझ पाओगे,
ख्यालों की महफिल से, कब-तलक़ दिल बहलाओगे?

आईनो की तलाश में, मेरा अक्स क्यों आवारा फिरे,
सिर्फ वजूद काफी है, खुद को महसूस करने के लिए|

समझाए जाते हैं मुझको, सितम ढाने के बाद,
खुद भी नम हुए जाते हैं, मुझको रुलाने के बाद|

तुम को मिले कफन-ए-सुकून जल्द ‘वीर’,
बहुत कुछ दफ़नाया है तुमने गए दिनों में|

जश्न-ए-आज़ादी मनाने को निकले हैं,
सबको कुछ जताने को निकले हैं|
कल लौट जाएंगे अपने पिंजरे को हम,
आज सिर्फ़ दिल बहलाने को निकले हैं|

आजाद वतन के हम आजाद लोग,
यूँ ही महके और रहें आबाद लोग|
इस साल ना हो कहीं फसाद कोई,
इस साल ना हो कहीं बरबाद लोग|

ऐसे ही जीते रहने की कोई वजह तो हो,
हमें अपने गुनाह की कोई खबर तो हो|

यूँ ज़ाया ना कर जीस्त की इनायत को ‘वीर’,
मिली है जो तुझे इतनी मिन्नतों के बाद|

चल हौसला उठा, किसी ख्वाब की ताबीर से,
हम भी देख लें तेरी आग के जलवे ‘वीर’|

ना उसकी खता थी ना हमारा ही कसूर था,
हम दोनों को आरजू थी किसी और ही दुनिया की|

भीगी आँखों से देखा है हमने धुंधले आसमान को,
कोई बादल सा पिघला है इन दामन के सायों में|

तुम्हारी आँखों में मैने देखा है,
खुद को अपनी सरहदों में बंधा|

मुझको हैरत से ना देख अक्स मेरे,
दरार मुझ में नहीं आईने में है|

मोहब्बत ज़िन्दगी जीने का एक सलीका है ‘वीर’,
इसे तुमने क्यों एक शख्स से मरासिम समझा|

उठा रहा हूँ खुद के पुर्ज़े आहिस्ता-आहिस्ता ‘वीर’,
अभी वक़्त लगेगा मुझे, फिर उठ खड़े होने में|

बंदिशें अदब की ज़ख्मों पर लगा देगा ‘वीर’,
क्यों रहे कोई गवाह उसके फ़ना होने का|

है ज़िम्मेदारियाँ मेरे कांधों पर ‘वीर’,
मुझे कोई शौक नहीं है जिये जाने का|

आया ना कोई भी नज़र हमें उस वक़्त,
उड़ा रहा था दर्द जब हमें तिनका-तिनका|

हाथ काँपते हैं और होंठ थरथराते हैं,
मुझसे खो गया है वो हौसलों वाला ‘वीर’|

सब्र टूटा तो सब बहा ले गया,
आया कहीं ना नज़र वो दश्त मोहब्बत का|

तुमसे ही कुछ खोया तो ज़रूर है ‘वीर’,
मैं नहीं तुमसे कुछ लूट के जाने वाला|

मैं उस मकाम तक जल्द ही पहुँच जाऊँगा ‘वीर’,
जब मुझे सिर्फ और सिर्फ अपनी जरूरत होगी|

तू चरागर नहीं ना ही हाकिम है ‘वीर’,
तुझसे क्या कहूँ क्यों मायूस बैठा हूँ|

तुमने क़ुरबत के ये क्या मायने लगाये हैं,
बिना कहे क्या इजहार मुमकिन नहीं है दर्द का|

ये कैसा गिला है ये कैसी शिकायत है ‘वीर’,
अपने माज़ी को अपना रक़ीब क्यों समझते हो|

ना विसाल की आरजू है ना फिराक का गम,
मुझे ले चल कहीं दूर बेखुदी मेरी|

तेरे सब्र का एक इम्तहान है ज़िन्दगी ‘वीर’,
साँस-साँस उतार रहा है क़र्ज़ कज़ा का|

कोई आठवाँ रंग दिखा मुझे ज़िन्दगी,
मैं उकता गया हूँ तेरे सात रंगों से|

अब ताकत नहीं है मुझमें बाकी ‘वीर’,
कह दो दरिया से, मैं तैयार हूँ डूबने के लिए|

एक साँस लूं तो यहाँ थम के ‘वीर’,
अरसा हुआ है भागते हुए मुझे|

क्या हुआ है ‘वीर’, कुछ भी तो नहीं,
बस ठुकराई है तुमने ज़िन्दगी बोझ सी|

तेरी अजीब सी दुनिया है, तेरे नायाब शौक हैं ‘वीर’,
बिकता है हर रोज़ यहाँ तू, एक उम्र खरीदने के लिए|

इन उजालों से आँख मेरी चुँधिया जाती है,
मुझे खोकले लगते हैं ख्याल ज़िन्दगी के|

इतना मुश्किल भी ना था नींद को मनाना ‘वीर’,
जागते रहे हम जब-तलक जिस्म ने घुटने नहीं टेके|

मुझको देखो मुझ में, हरकत बाकी है अभी,
थके हैं हौसले मगर, हसरत बाकी है अभी|

ये उम्मीद भी बहूत बेशरम है ‘वीर’,
ना जाने क्यों आती है इस दर को बार-बार|

गिरता गया मैं इतना उनकी नज़र में,
मिला ना पाया नज़र कोई यार, गुज़रे ज़माने का|

मैं अक्सर देखा करता हूँ उस घूमते हुए पंखे को,
कैसे मतलब ढूढ़ता है अपने वजूद का हर रात|

महफिल कोई फिर ढूँढ ही लेगा दिल मेरा,
इस दुनिया में कम नहीं है तादाद दिलजलों की|

नाम मेरा लेकर वो जाने क्यों डूबा ‘वीर’,
मैं ना मसीहा हूँ और ना कातिल उसका|

हमने कच्ची ही सही, मगर दीवारें बना ली हैं,
सैलाबों को खबर तो हो हमारे मंसूबों की|

ना आ सकेगा लौट कर, इतनी दूर तो गया नहीं,
अभी कुछ ही वक़्त तो हुआ है, मुझे उसे खोय हुए|

इस मंजिल से शिकायत यही है ‘वीर’,
ये दे ना पाई मुझे वापसी का रास्ता|

बर्दाश्त तुम्हें अभी और बहूत कुछ करना है,
अभी से ना खिचो लकीरें हदों की ‘वीर’|

ये सच है के वो बुरा ना चाहेगा मेरा,
ये मुमकिन है की खता कोई, उससे हो जाए|

रहनुमा बनकर तेरे साथ तो चल सकता हूँ ‘वीर’,
मगर उम्मीद ना रख, के हर ठोकर पर तुझे सँभालू|

हिसाब तुमसे ना मांगेगी ये ज़िन्दगी कभी ‘वीर’,
मैंने सौदा कर लिया है खामोशी का इससे|

हम से वादे तो किए थे कई वफ़ा ने,
ना उसे ही निभाते बना, ना हम ही उम्मीद रख सके|

गुज़रा है पहले भी कुछ ऐसा ही दिन ‘वीर’,
जैसे कोई भवँर हमें उसी मोड़ पर ले आया है|

आप जैसे कदरदान हों तो हुजूम की जरूरत क्या है,
महज दो लफ्ज़ प्यार के और दिल-ए-मज़लूम की जरूरत क्या है|

तुमने देखा –
कैसे लकीरें हमारे हाथों की मिल जाती हैं,
जैसे किसी ने बड़ी बारीक़ी से इन्हें बनाया है|

हर किसी को मिली नहीं है इनायत गहराई की ‘वीर’,
हमने देखे हैं यहाँ कई समंदर उथले हुए|

नाराज़ तुम भी हो और खफा हम भी ज़िन्दगी से,
एक सिक्के के दो चेहरों सी है हमारी दास्तान|

इन लफ़्ज़ों को ओढ़ कर सो जाना आज की शब,
इन्हें बड़ी शिद्दत से संजोया है तुम्हारे लिए|

चलो कूच करो बिस्तर को तुम ‘वीर’,
अभी जंग बाकी है नींद से तुम्हारी|

अंजाम-ए-बेखुदी महंगा ना पड़ जाए ‘वीर’,
पिया कर मगर थोड़ा हिसाब रख कर|

लफ़्ज़ों में बहूत ताकत होती है ‘वीर’,
देख कैसे जोड़ कर रखा है इन्होंने टूटा दिल तेरा|

गम भी अपना है और खुशी भी अपनी ‘वीर’,
यूँ जोड़ कर ना देखा कर दो हाथों की लकीरें|

मोहब्बत और आईने में फर्क होता है ‘वीर’,
उसकी आँखों में उसका नज़रिया है, तेरा अक्स नहीं|

ये बात और है के तुझसे जुदा नहीं मैं,
ये मलाल अपनी जगह, के नजदीकियां और हो सकती थी|

शहर-ए-मोहब्बत से कारवाँ कब का जा चुका ‘वीर’,
अब ढूंढता क्यों है जाना पहचाना कोई|

बदलते हालातों पर अपनी नज़र रख ‘वीर’,
कहीं अजनबी ना लगे एक दिन तुझे अपनी ज़िन्दगी|

मुझसे टकरा कर कई लहरों ने दम तोड़ा है,
मैंने पहले भी कई बार समंदर से दुश्मनी की है|

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