ख्वाब देखा न करो

ख्वाब देखा न करो, खुली आँखों से,
इसकी कीमत देनी होती है, अधूरी सांसों से|

हकीकत बदलती नहीं बस धुंधला जाती है,
लकीरें कहाँ मिटती हैं, किसी के हाथों से|
ख्वाब देखा न  करो, खुली आँखों से…

आदमी अकेला था और अकेला ही रहेगा,
क्या उम्मीद लगाई है तुमने रिश्ते-नातों से|
ख्वाब देखा न  करो, खुली आँखों से…

सच को महसूस करो और सच रहने दो,
इसे चेहरा न दो ज़माने की फरेब बातों से|
ख्वाब देखा न  करो, खुली आँखों से…

कुछ  अनसुना सा तो हुआ नहीं है यहाँ,
सुनते आये हैं यही फ़साना हम हज़ारों से|
ख्वाब देखा न  करो, खुली आँखों से…

उस रोज़ जो तुमने देखा था मेरी आँखों में,
रिसता हुआ लम्हा था, ज़हन की दरारों से|
ख्वाब देखा न  करो, खुली आँखों से…

काले बादल  फिर छाये हैं उसके फलक  पर,
फिर उलझा है ‘वीर’, काली अँधेरी रातों से|
ख्वाब देखा न  करो, खुली आँखों से…

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  • Deevasg

    Very Nice!!
    लकीरें कहाँ मिटती हैं, किसी के हाथों से|
    Yeh to kamall ka tha!!

  • sangeetaswarup

    आदमी अकेला था और अकेलाही रहेगा,क्या उम्मीद लगाई है तुमनेरिश्ते-नातों से|ख्वाब देखा न  करो, खुलीआँखों से…
     
    वाह …. बहुत सुन्दर 

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