आमद

खैर इस बार उसका होना अजीब न था.. हाँ अजीब था उसका बेवक्त आना| सहर से सतह पर कोई नमी के निशां नहीं थे| और सुबह से बच्चों की किलकारियां कानों में शहद घोल रही थी| एक खूबसूरत दिन अंगड़ाई लेकर बिस्तर से उठा था| दोपहर की भाग-दौड ने फुर्सत को बैठने का मौका ही नहीं दिया| जिस्म थकान उतरने के लिए सिरहाना ढूँढता हुआ, फर्श पर लेट गया| और कुछ घंटो के लिए वक्त भी करवट लेकर सो गया..

आँख खुली! तो कोई मायूसी बिना आहट के कमरे में बैठी मिली| न जाने कहाँ से उसे मेरे ठिकाने की खबर हो चली थी| खामोश.. वो मेरी नींद से उठने की ताक में बैठी थी| मैं शाम की यकायक आमद से थोडा बोखलाया हुआ था| किचन में चाय के बरतनों की तलाश करते हुए मैं उनमें अपना सुकून भी दूंढ रहा था| शायद यहीं कहीं हो.. मैंने उसे घर में ही तो रखा था|

कार! मेरी कार| सिर्फ ट्रांसपोर्ट का ज़रिया नहीं है| मैं कई बार इस में बैठ कर ज़हन के कई कोने घूम आया करता हूँ| मैंने खयालों के कई अनजान, मुश्किल और लंबे सफर तय किये है इसमें|

अपनी बेसबब मायूसी को साथ लिए, में कार से ख्यालों के कई रास्ते से होता हुआ.. चाय की उस दूकान तक पहुंचा| इस दूकान पर मैं कई बार आ चुका हूँ| जाने क्या – क्या न मिल जाता है यहाँ चाय के साथ| आज चाय की प्याली के साथ चंद शेर और एक नज़्म भी मिली| बीस रुपये में इतना कुछ कम ही जगहों पर मिलता है| ये या भी हो सकता है के मुझे कीमत का सही अंदाज़ा न हो|

मैं अपनी मायूसी को देख रहा हूँ| सामने टेबल पर बैठे  वो कल शाम का ज़िक्र कर रही है| और रात की बढती हुई ठण्ड में गम की शौल ओढ़े हुए मुझसे घर चलने को कह रही है| ये सिलसिला तो पहले भी कई बार हुआ है| लेकिन.. गम इतनी आहिस्ते आते हुए कम ही देखा है|

चलिए.. बादल घिर आये हैं.. और रात आँखें बिछाये इंतज़ार में है| चलिए.. चलता हूँ!

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