घर को जाता हूँ

घर को जाता हूँ…

बहुत कुछ बिखरा है वहाँ,
टुकड़े हैं मेरे कुछ फर्श पर|

दीवारों पर धबे हैं मेरे झूट के|
फीका पड़ गया हैं इनका रंग… इन्हें धोना है |
घर को जाता हूँ…

मेरी तस्वीरों पे गर्द है|
किताबें उसूलों की डेस्क में बंद है|
सपने सीलिंग पे लटके लटके थक गए है|
बहुत काम है!
घर को जाता हूँ…

अलमारी में सहेज रखे थे साफ कपडे,
इन्हें फिर से धोना है ज़मीर के जैसे|

मेरी खुशबू आती थी गलियारे में|
हर हवा का झोंका मेरे वजूद का था|
वहाँ अब सीत है ज़माने की|
घर को जाता हूँ…

वो दरवाज़ा जंग खाया होगा|
मेरी चाबी से नहीं खुलेगा|
उसको तोडना पड़ेगा|

काफी प्यारा है मुझे वो…
मेरे अपनों जैसा!
घर को जाता हूँ…

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  • ओह!! जाना तो मुझे भी है…

    बढ़िया रचना!!

    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

  • nice

  • sanja bhaskar

    बहुत सुन्दर रचना । आभार
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    Sanjay kumar

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