कभी यूँ भी हुआ

कभी यूँ भी हुआ के,
रास्ते मंजिलों से जुदा हो गए|

जलकर आग-ए-कुर्बत में,
हम एक रोज़ धुआं हो गए|

कोई और नहीं,
हम ही दुश्मन थे खुद के|
अपना गिरेबान झाँका,
और गुनाहों के खुदा हो गए|

इबादत और इश्क में,
फासला रखना ज़रूरी था|
इतना माँगा तुझे हमने,
मिसाल-ए-दुआ हो गए|

मैं तुमसे सच कहने की,
ताक़त भी रखता हूँ|
तुम तो इसकी आगाज़ से,
मुझसे खफा हो गए|

0.00 avg. rating (0% score) - 0 votes
%d bloggers like this: