लंगड़ा वक्त

यादों के बोझ से वक्त लंगड़ा गया है!

घड़ी के दो काँटों की बैसाखी लिए..
शाम से रेंग रहा है यहाँ|
इसके हर कदम की आहट साफ़ साफ़ सुनाई देती है|

यही वक्त था जो हमारे हाथों से यूँ फिसल जाया करता था|
कैसे ख़ामोशी से ये अपने तेज कदम रखता था|

आकर देखो,
मैंने इसे कुछ लम्हों से कैसे बांध दिया है!
लंगड़ा वक्त!!

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