पहचाना सा दर्द था

पहचाना सा दर्द था,
मिल चूका था इसे कई साल पहले|

भरा हुआ ज़ख्म,
फिर अचानक सांस लेने लगा|

मानो किसी टूटी हुई टहनी में जडें निकल आयी हों…

ज़हन घबराया था,
फिर उसी आहट से|

पिछले मौसम बहूत कुछ छीना था इसने मुझसे|

मेरे दो चेहरे,
दो हिस्से हो गए थे|

आज और कल, दोनों आमने-सामने मुझे खामोश देख रहे थे|

मुमकिन न-मुमकिन,
आरजू और हकीकत|

एक ऐसे रुसवाई जिससे मैं समझ ना पाया|

बंदिशें तो तोड़ी हैं बहूत,
पर ये तो मेरा कुछ अपना ही है|

मुन्तजिर एक जिंदिगी का,
उसे इस जिंदिगी से पहले पा नहीं सकता|

जिंदिगी ने करवट तो ली मगर बहुत देर से|

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  • बहुत सुन्दर रचना ! … आभार

    • @पदम, काफी समय बाद आपसे बात हुई है|
      आशा करता हूँ की आप सकुशल हैं|
      वीर

  • Chandrama

    This looks like a new style in your poetry.
    मानो किसी टूटी हुई टहनी में जडें निकल आयी हों…Beautiful Image.

    Keep Writing. Your words have a great connect 🙂

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